पता नही ऐसा क्यों, मगर आप कितने भी बड़े कवि को बड़े-बड़े मंचों पर सुनेंगे तो यही लगेगा कि वे पुराना प्रदर्शन ही दोहरा रहे हैं। हाल ही में जो कवि-सम्मलेन हुआ था उनके कलाकार पहले भी सन्स्थान में आए हुए थे, सब बातें नई और चुटीली कर रहे थे लेकिन कविता वही सुनाने लगते थे जो पहले भी सुनाकर गए थे। एक दर्शक की पीड़ा से ज्यादा तो कवि ख़ुद समझते होंगे क्योंकि वे तो अक्सर कई सम्मेलनों में जाते हैं, इसीलिए उन्हें जो भी कविता सुनने को मिलती होगी वे पहले ही उसे सुन चुके होते होंगे। तब तो वह इस दर्द को बखूबी समझते होंगे लेकिन जब वही मंच पर जाते हैं तो इस दर्द पर मलहम लगाना तो दूर, इसे जिन्दा करने लगते हैं। दरअसल उनकी कोई गलती नहीं होती है, गलती तो उनके अंदर का वो कलाकार कर देता है जिसे उसकी पुरानी कला ने मोह-पाश में बाँध रखा है। अब कलाकार तो कोमल होता है, वह अपनी पुरानी कला को नाराज़ नहीं कर सकता है न, इसीलिए ये गलती कर बैठता है । ऐसी बात नही होती है कि ये कवि या कलाकार होनहार नही होते या ये कुछ नया नहीं लिखते हैं। दरअसल ये बहुत नई रचनाओं का सृजन करते हैं मगर नई रचनाओं को प्रस्तुत करके अपनी छवि को खोने का हौवा सताता है। ये कवि अपनी छवि नही खोना चाहते हैं। क्या होगा कहीं ये नई रचना जनता को पसंद नहीं आए या शायद इस भीड़ में ज्यादा लोग तो मुझे पहली बार सुन रहे हैं, उन्हें तो पुरानी वाली रचना जरूर सुनानी चाहिए। शायद इस तरह के प्रश्न उठते होंगे उनके दिमाग में ...
अब दिमाग से याद आया कि इसकी संरचना बहुत ही जटिल होती है, अनेक कोशिका, अनेक तंत्रिका, जिनमें से कुछ जुड़े-जुड़े होते हैं और कुछ अलग-अलग होते हैं। सीखने की प्रक्रिया में ये शायद हमारी मदद करती है। अब कला भी एक सीखने की ही प्रक्रिया है, जिसमे अभ्यास की दरकार होती है। जब शुरू-शुरू में कला का जूनून सवार होता है तो हम उसका बहुत अभ्यास करते हैं और जितना अभ्यास करते हैं उतने ही मजबूत तरीके से दिमाग की कोशिकाएं जुड़कर उस ख़ास कला के मार्ग का निर्माण कर देती है। अब हम यहाँ-वहाँ मंच ढूंढते हैं और हममें से कुछ भाग्यशाली लोग अपनी कला के प्रशंसक को पा लेते हैं। कुछ दिनों बाद एक छवि बन जाती है अब हमारा काम बढ़ जाता है और अब छवि को भी संभालकर रखना है। इसीलिए एक बार चमकने के बाद जो कला का निर्माण हम करते हैं शायद पहली की तरह सख्त नही हो पाती, मेरा मतलब दिमाग कि कोशिकाएं उसके लिए कम मजबूती से जुड़ती होंगी। इसीलिए जब भी हम मंच पर जायेंगे, नए प्रदर्शन के लिए मन में डर आएगा और हम फ़िर से पुराने प्रदर्शन की ही पुनरावृति करेंगे ।
Sunday, March 15, 2009
Sunday, February 8, 2009
सोचने के लिए हम किस भाषा का प्रयोग करते हैं?
मैं जानता हूँ कि आपका जवाब हिन्दी ही होगा और हो सकता है कि आप हिन्दी में ही सोचते हों मगर क्या इसका मतलब हम ये मान लें कि हम अपनी मातृभाषा में ही सोचते हैं। बहुदा मैंने बहुत लोगों के मुंह से ये कहते सुना है कि अमुक भाषा से तो मुझे सम्बन्ध रखना ही है, आख़िर हम सोचते तो अमुक भाषा में ही हैं। मैंने बहुत जगह हिन्दी प्रचार में भी सुना है कि आइये हिन्दी से जुडें, क्यूंकि सोचते तो हम हिन्दी में ही हैं। दरअसल इनका कहना होता है कि हम कितने भी दूसरी भाषा या विदेशी भाषा का प्रयोग जीवन में कर लें सोचने के लिए अपनी मातृभाषा का ही प्रयोग करते हैं। शायद इनका कहना सही भी हो मगर इस लेख में मैं एक अलग मत प्रस्तुत कर रहा हूँ।
सबसे सच बात ये है कि हमारे दिमाग पर वो भाषा हावी होती है जो भाषा बाजार में प्रयोग होती है। आजकल के जीवन में बाज़ार एक अहम् स्थान रखता है और प्रचार-प्रसार माध्यमों के बढ़ जाने से ये हमारे जीवन के निकटतम होता जा रहा है। इसीलिए हमारे सोच पर ये बाज़ार की भाषा हावी हो जाती है, अब भला बाज़ार में ' INDIA SHINING' के नारे चले तो भला कोई भारतवासी क्यूँ सोचेगा कि भारत चमक रहा है। इसी तरह आज के समय हमारे बाज़ार में जो भी स्लोगन है अधिकतर अंग्रेजी में है फ़िर ये सोचना कि हम सोचने के लिए मातृभाषा का इस्तेमाल करते होंगे, थोड़ी सी नाइंसाफी है। ये तो छोटी सी बात हुई, एक बड़ी बात ये भी है कि हमारे यहाँ का एक बड़ा सा भाग पढाई-लिखाई करता है, और सामान्यतः बड़ी पढाई के लिए अंगरेजी माध्यम का ही इस्तेमाल करता है। अब इस भाषा पर हमारा कैरियर निर्भर करता है, इसी भाषा में हमें विचार विक्सित (Idea development) करने हैं, तो भला आप बताएं कि हमारे सोचने की भाषा क्या हो सकती है, निश्चित तौर पर कहीं न कहीं यहाँ भी बाज़ार किसी रूप में प्रभाव डाल रहा है।
इसके अलावा हमारे सोच पर वो भाषा भी बहुत प्रभाव डालती है जो हमारी इन्द्रियों के सबसे करीब हो, और आज के युग में हमारी इन्द्रियों को सबसे ज्यादा प्रभावित करने के साधनों में से एक है इन्टरनेट , और इन्टरनेट की भाषा भी हमारे सोच पर असर डालती है। ये तो गूगल को धन्यवाद कहना होगा कि थोडी-बहुत हिन्दी-प्रयोग इन्टरनेट पर हो जाती है और इसलिए हमलोग हिन्दी में भी सोच लेते हैं। एक और साधन भी है मीडिया और चलचित्र, साधारनतया हम चलचित्र जिस भाषा की देखने की शौक रखते हैं, उसी भाषा के डायलोग और गाने हमारे दिमाग में चलने लगते हैं और फ़िर उस भाषा में सोचने से कोई मातृभाषा नहीं रोक सकती है। दूसरी बात भी सही ही है कि जिस भाषा के मीडिया का इस्तेमाल करेंगे उसी भाषा में तर्क और प्रश्न हमारे मन में उठेंगे । और भी बहुत सारे साधन और माध्यम हैं जो हमारी सोच और भाषा को प्रभावित करती है , लेकिन हर किसी का सम्बन्ध बाज़ार से जुड़ा हुआ रहता है।
इसीलिए हम सोचने के लिए मातृभाषा से ज्यादा अपने बाज़ार की भाषा का प्रयोग करते हैं !!
सबसे सच बात ये है कि हमारे दिमाग पर वो भाषा हावी होती है जो भाषा बाजार में प्रयोग होती है। आजकल के जीवन में बाज़ार एक अहम् स्थान रखता है और प्रचार-प्रसार माध्यमों के बढ़ जाने से ये हमारे जीवन के निकटतम होता जा रहा है। इसीलिए हमारे सोच पर ये बाज़ार की भाषा हावी हो जाती है, अब भला बाज़ार में ' INDIA SHINING' के नारे चले तो भला कोई भारतवासी क्यूँ सोचेगा कि भारत चमक रहा है। इसी तरह आज के समय हमारे बाज़ार में जो भी स्लोगन है अधिकतर अंग्रेजी में है फ़िर ये सोचना कि हम सोचने के लिए मातृभाषा का इस्तेमाल करते होंगे, थोड़ी सी नाइंसाफी है। ये तो छोटी सी बात हुई, एक बड़ी बात ये भी है कि हमारे यहाँ का एक बड़ा सा भाग पढाई-लिखाई करता है, और सामान्यतः बड़ी पढाई के लिए अंगरेजी माध्यम का ही इस्तेमाल करता है। अब इस भाषा पर हमारा कैरियर निर्भर करता है, इसी भाषा में हमें विचार विक्सित (Idea development) करने हैं, तो भला आप बताएं कि हमारे सोचने की भाषा क्या हो सकती है, निश्चित तौर पर कहीं न कहीं यहाँ भी बाज़ार किसी रूप में प्रभाव डाल रहा है।
इसके अलावा हमारे सोच पर वो भाषा भी बहुत प्रभाव डालती है जो हमारी इन्द्रियों के सबसे करीब हो, और आज के युग में हमारी इन्द्रियों को सबसे ज्यादा प्रभावित करने के साधनों में से एक है इन्टरनेट , और इन्टरनेट की भाषा भी हमारे सोच पर असर डालती है। ये तो गूगल को धन्यवाद कहना होगा कि थोडी-बहुत हिन्दी-प्रयोग इन्टरनेट पर हो जाती है और इसलिए हमलोग हिन्दी में भी सोच लेते हैं। एक और साधन भी है मीडिया और चलचित्र, साधारनतया हम चलचित्र जिस भाषा की देखने की शौक रखते हैं, उसी भाषा के डायलोग और गाने हमारे दिमाग में चलने लगते हैं और फ़िर उस भाषा में सोचने से कोई मातृभाषा नहीं रोक सकती है। दूसरी बात भी सही ही है कि जिस भाषा के मीडिया का इस्तेमाल करेंगे उसी भाषा में तर्क और प्रश्न हमारे मन में उठेंगे । और भी बहुत सारे साधन और माध्यम हैं जो हमारी सोच और भाषा को प्रभावित करती है , लेकिन हर किसी का सम्बन्ध बाज़ार से जुड़ा हुआ रहता है।
इसीलिए हम सोचने के लिए मातृभाषा से ज्यादा अपने बाज़ार की भाषा का प्रयोग करते हैं !!
Friday, December 5, 2008
शहरों के बच्चे ज्यादा तेज क्यों ?
दरअसल इस ब्लॉग पर मैं समसामयिक विषयों पर विचार व्यक्त करता रहता था, मगर समसामयिक घटनाओं में ऐसी-ऐसी उथल-पुथल मचने लगी कि वक़्त की राजनीति मेरे समझ से बाहर हो गयी। अब भला इतने लोग इस्तीफे-उस्तीफे दे रहे हैं, कहीं भी कुछ भी हो रहा है, अब कैसे समझ में आए कि क्या हो रहा है ? अभी तो मैं एक छात्र ठहरा, इसीलिए सोचा कि शिक्षा और विषयों पर ही कुछ लिखना शुरु करता हूँ।
सचमुच में कहें तो इस वक़्त शिक्षा भी सरकार के सामने एक विकट समस्या है, खासकर अपने राज्य बिहार के बारे में तो मूझे जानकारी है। गाँव-गाँव में स्कूल खुले हुए हैं, मगर पढने को छात्र नहीं आते हैं, इसपर सरकार ने मध्याहन काल में भोजन भी रखा, स्कूल में शिक्षकों की संख्या काफी बढायी और तब जाकर छात्र आते हैं। सामान्यतः देखा जाता है कि शहरों के बच्चे गाँव के बच्चों की तुलना में पढायी-लिखाई में ज्यादा सफल होते हैं, इसका कारण लोग पैसा समझ लेटे हैं। एक तरह से यही कारण होता है मगर जब गाँव में भी इतनी सुविधा दे दी जाती है तब भी परिणाम यही निकलता है। अगर गाँव का कोई पराक्रमी शिक्षक जी-जान भी लगा देता है तो चंद प्रतिभाओं को ही स्वरुप दे पाता है जबकि शहरों के बच्चों पर इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ती है। इसका कारण हमारे प्रवृति के गर्भ में छिपा है। दरअसल ये सीखने की प्रवृति बहुत कुछ माहौल और वातावरण पर निर्भर करता है जो कि शहरों के बच्चों के लिए सुलभ हो जाता है। हमारे सीखने और समझने की प्रवृति मुख्यतः तीन तरह की होती है: सुनकर समझना, अभ्यास से समझना, कल्पनाशक्ति से समझना। अभ्यास से समझने में परिश्रम की दरकार होती है जिससे हर बचपन हिचकता है। जहाँ तक सुनकर समझने और कल्पनाशक्ति का सवाल है तो ये दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, कुछ लोग सीखने के लिए पहले शब्दों को सुनकर समझ लेते हैं और फ़िर उसपर बार-बार मन में कल्पना करके सीख लेते हैं। जबकि दूसरे लोग उन्हीं सुने हुए शब्दों को तभी समझ पाते हैं जब उनके बारे में कुछ कल्पना कर पाते हैं । जैसे अगर आप दूसरे तरह के लोग हैं तो आप मेरे इस लेख को तभी समझ पायेंगे अगर आपको हिन्दी से अच्छी तरह परिचित होंगे और इस लेख के भारी शब्दों से परिचित होंगे अन्यथा आपको समझाना टेढी खीर है। इसका अर्थ ये हुआ कि आपको बहुत ज्यादा समझदार होने के लिए बहुत ज्यादा शब्दों का मतलब जानना जरूरी है।
अब हम लेख पर फिर से वापस आ जाते हैं कि क्यों शहरों के छात्र ज्यादा तेज हो जाते हैं। शहरों में अभिभावक गांवों की तुलना में अपने बच्चों से ज्यादा बातें करते हैं, जिससे बच्चे ज्यादा शब्दों के जानकार हो जाते हैं। उनके पास समाचार पत्र , पत्रिकाएं, कॉमिक्स, किताबें ज्यादा से ज्यादा उपलब्ध रहती है, जिससे वे ज्यादा शब्दों की जानकारी हासिल कर लेते हैं। वहाँ बिजली की सुविधा ज्यादा होती है, जिससे टेलीविजन पर चलने वाले शो, न्यूज, कार्टून, फ़िल्म भी ज्यादा शब्दों को सीखने में मदद कर देते हैं। इनसब कारणों से हम अनुमान लगा सकते हैं कि एक दस साल का बच्चा जो पांचवीं पास करता है, अगर वह शहर का है तो उसके पास पाँच सौ गुना ज्यादा शब्दों की अधिक जानकारी है। अब अगर उस बच्चे को कुछ सिखाना हो तो उसे सीखने और समझने में ज्यादा आसानी होगी, जबकि गाँव के बच्चे को सिखाने में आपको भी तकलीफ ही होगी। बचपन का दस साल कुछ अनोखा होता है, उस वक्त सीखे गए शब्द आपपर अनोखा प्रभाव छोड़ता है, वे आपके प्राकृतिक मित्र बन जाते हैं। बचपन में जिस चीज में आपकी रूचि बन जाती है वही आपके जीवन पर अमिट प्रभाव छोड़ती है, शायद इसका भी उपर्युक्त कारण ही होता है । इसीलिए अगर सरकार गाँव-गाँव में शिक्षा का प्रचार-प्रसार कर रही है तो उसका मकसद वहाँ के छात्रों को तेज-तर्रार भी बनाना होना चाहिए। वहाँ सार्वजनिक पुस्तकालय, वाचनालय की व्यवस्था होनी चाहिए, बिजली जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध होनी चाहिए, तब जाकर गांवों के बच्चे भी शहरों के बच्चों की तरह तेज बन पायेंगे।
सचमुच में कहें तो इस वक़्त शिक्षा भी सरकार के सामने एक विकट समस्या है, खासकर अपने राज्य बिहार के बारे में तो मूझे जानकारी है। गाँव-गाँव में स्कूल खुले हुए हैं, मगर पढने को छात्र नहीं आते हैं, इसपर सरकार ने मध्याहन काल में भोजन भी रखा, स्कूल में शिक्षकों की संख्या काफी बढायी और तब जाकर छात्र आते हैं। सामान्यतः देखा जाता है कि शहरों के बच्चे गाँव के बच्चों की तुलना में पढायी-लिखाई में ज्यादा सफल होते हैं, इसका कारण लोग पैसा समझ लेटे हैं। एक तरह से यही कारण होता है मगर जब गाँव में भी इतनी सुविधा दे दी जाती है तब भी परिणाम यही निकलता है। अगर गाँव का कोई पराक्रमी शिक्षक जी-जान भी लगा देता है तो चंद प्रतिभाओं को ही स्वरुप दे पाता है जबकि शहरों के बच्चों पर इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ती है। इसका कारण हमारे प्रवृति के गर्भ में छिपा है। दरअसल ये सीखने की प्रवृति बहुत कुछ माहौल और वातावरण पर निर्भर करता है जो कि शहरों के बच्चों के लिए सुलभ हो जाता है। हमारे सीखने और समझने की प्रवृति मुख्यतः तीन तरह की होती है: सुनकर समझना, अभ्यास से समझना, कल्पनाशक्ति से समझना। अभ्यास से समझने में परिश्रम की दरकार होती है जिससे हर बचपन हिचकता है। जहाँ तक सुनकर समझने और कल्पनाशक्ति का सवाल है तो ये दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, कुछ लोग सीखने के लिए पहले शब्दों को सुनकर समझ लेते हैं और फ़िर उसपर बार-बार मन में कल्पना करके सीख लेते हैं। जबकि दूसरे लोग उन्हीं सुने हुए शब्दों को तभी समझ पाते हैं जब उनके बारे में कुछ कल्पना कर पाते हैं । जैसे अगर आप दूसरे तरह के लोग हैं तो आप मेरे इस लेख को तभी समझ पायेंगे अगर आपको हिन्दी से अच्छी तरह परिचित होंगे और इस लेख के भारी शब्दों से परिचित होंगे अन्यथा आपको समझाना टेढी खीर है। इसका अर्थ ये हुआ कि आपको बहुत ज्यादा समझदार होने के लिए बहुत ज्यादा शब्दों का मतलब जानना जरूरी है।
अब हम लेख पर फिर से वापस आ जाते हैं कि क्यों शहरों के छात्र ज्यादा तेज हो जाते हैं। शहरों में अभिभावक गांवों की तुलना में अपने बच्चों से ज्यादा बातें करते हैं, जिससे बच्चे ज्यादा शब्दों के जानकार हो जाते हैं। उनके पास समाचार पत्र , पत्रिकाएं, कॉमिक्स, किताबें ज्यादा से ज्यादा उपलब्ध रहती है, जिससे वे ज्यादा शब्दों की जानकारी हासिल कर लेते हैं। वहाँ बिजली की सुविधा ज्यादा होती है, जिससे टेलीविजन पर चलने वाले शो, न्यूज, कार्टून, फ़िल्म भी ज्यादा शब्दों को सीखने में मदद कर देते हैं। इनसब कारणों से हम अनुमान लगा सकते हैं कि एक दस साल का बच्चा जो पांचवीं पास करता है, अगर वह शहर का है तो उसके पास पाँच सौ गुना ज्यादा शब्दों की अधिक जानकारी है। अब अगर उस बच्चे को कुछ सिखाना हो तो उसे सीखने और समझने में ज्यादा आसानी होगी, जबकि गाँव के बच्चे को सिखाने में आपको भी तकलीफ ही होगी। बचपन का दस साल कुछ अनोखा होता है, उस वक्त सीखे गए शब्द आपपर अनोखा प्रभाव छोड़ता है, वे आपके प्राकृतिक मित्र बन जाते हैं। बचपन में जिस चीज में आपकी रूचि बन जाती है वही आपके जीवन पर अमिट प्रभाव छोड़ती है, शायद इसका भी उपर्युक्त कारण ही होता है । इसीलिए अगर सरकार गाँव-गाँव में शिक्षा का प्रचार-प्रसार कर रही है तो उसका मकसद वहाँ के छात्रों को तेज-तर्रार भी बनाना होना चाहिए। वहाँ सार्वजनिक पुस्तकालय, वाचनालय की व्यवस्था होनी चाहिए, बिजली जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध होनी चाहिए, तब जाकर गांवों के बच्चे भी शहरों के बच्चों की तरह तेज बन पायेंगे।
Friday, November 28, 2008
आतंक का रूप, कितना कुरूप
पिछले ४८ घंटों से पूरा मुंबई आतंक के साए से सहमा हुआ है, और उस साए को पूरी तरह से हटने का अब भी इंतजार कर रहा है । इस वक़्त माहौल में दहशत दिखता है तो सड़कों पर सूनापन सा, लोगों ने अपने टी.वी.चैनल पिछले दो दिनों से बंद नहीं किया है और कुलाबा और नरीमन का इलाका किसी युद्धक्षेत्र में बदल चुका है। मुझे ९३ का बमकांड तो याद नहीं है मगर जब से याद है आतंक का ये रूप सबसे ज्यादा कुरूप है । 'डाई हार्ड' जैसी प्रसिद्ध चलचित्रों में ही ऐसे दहशत देखे थे पर वास्तविकता में ऐसी स्थिति सोचना कल्पना से परे लगता है। केवल दो दर्जन लोगों ने पूरे देश को भयभीत कर दिया है और इस दो दिनों में ही पूरे देश का नक्शा बदल कर रख दिया है, अब इससे ज्यादा कुरूप दृश्य और क्या हो सकता है। पुलिस के तीन सुपर जांबाज़ जो कि अखबारों की सनसनी रहते थे अब वे काल के गाल में समा गए। क्रिकेट के दो वन-डे और चैंपियन ट्रोफी टी-२० का रद्द होना ही ये बतला रहा है कि हमारे और भी बहुत सारे महत्वपूर्ण कार्य रद्द हो चुके होंगे। पूरे दुनिया के मीडिया इस वक़्त मुंबई को ही समाचार बनाए हुई है, इससे हमारा बाजार और पर्यटन कितना चौपट होगा वो तो समय बतायेगा। भारत की छवि को तो इन दो दर्जन लोगों ने तो बदल कर रख दिया, मगर इन्हें बचने का भी हक़ नहीं होना चाहिए । एक बात प्रशसा के योग्य है कि भारत भी अब अमेरिका, ब्रिटेन, रूस की तरह किसी भी समझौते से इनकार कर अन्तिम कार्रवायी कर रहा है। जबकि प्रशंसा और भी तब होगी जब भारत भी आतंकवाद के ख़िलाफ़ वही रूख अपनाए जो अमेरिका ने ९/११ के बाद अपनाई थी .
Monday, November 24, 2008
बुद्धिमता
'बुद्धिमता' एक बहुत ही अच्छा शब्द है, सम्भव है कि इससे आप भी परिचित होंगे, शायद इस शब्द से आपका भी कोई रिश्ता हो । पर मुझे इससे अपने रिश्ते होने पर बराबर शक रहा है , शायद यही कारण है कि इसपर आज एक पोस्ट भी लिखने जा रहा हूँ । कारण ये है कि बचपन से आजतक जब भी कोई गलती करता हूँ तो कोई न कोई टोक देता है कि जरा बुद्धि से काम ले लिए होते। और गलतियां तो मैं बार-बार करता हूँ और ऎसी-ऐसी टिप्पणियों का शिकार बनता हूँ । दिक्कत तो ये होने लगती है कि फॉर्म भरने में गलती हो गई तो यही डायलाग सुनो, रिक्सवाले ने ज्यादा किराया ले लिया तो भी यही डायलाग सुनो, कभी दोस्तों से सुनो तो कभी माता-पिता से। आख़िर सोचना पड़ता है कि हमसे बुद्धिमता जी सचमुच तो नाराज़ नहीं हैं, पर फ़िर सोचने लगता हूँ कि इतने बड़े-बड़े इम्तिहान पास किए और इतना ज्यादा-ज्यादा अंक लाया हूँ । दरअसल मुझे सोचने कि ऐसे ही आदत है, कुछ भी सोचता रहता हूँ , जैसे अभी-अभी सोचने लगा हूँ कि बुद्धिमताजी मुझसे ऐसे ही नाराज होते रहती है। ये सब जो विद्वता जी की कृपा रहती होगी मुझपर जो मैं संकट से बच जाता हूँ।
ये विद्वता और बुद्धिमता दो अलग-अलग चीज होती है, पर देखने में एक जैसे ही लगती है । हो सकता हो कि अपने पिछले जन्म में दोनों जुड़वां बहने रही हों। अन्तर जानने के लिए हम कह सकते हैं कि मनमोहनजी के पास विद्वताजी हैं और लालूजी के पास बुद्धिमताजी । इसीलिए किसी को कमजोर नहीं कह सकते हैं, पर हाँ एक बात है कि अगर आपपर विद्वता कि कृपा है तो बुद्धिमता पा सकते हैं मगर बुद्धिमता की ज्यादा कृपा हो गई तो पता नहीं आपमें विद्वता आ पाये या नहीं। ऐसा इसलिए की बुद्धिमता की महिमा अपरम्पार है । ये बहुत ही चतुर हुआ करती है, सारी बातें चुटकियों में समझ जाए, बोलने में भी चतुराई दिखाए और हर परिस्थितियों में ढल जाए, ऐसी इनकी विशेषता हुआ करती है। दरअसल ऐसा माना जाता था कि अगर आप जितनी चतुराई और सतर्कता से अपने आपको विपरीत परिस्थितियों में भी तेजी से ढाल लेते हैं, आप उतने ही बुद्धिमान कहलाते हैं। फ़िर हुआ क्या कि विद्वान लोग हो-हल्ला मचाने लगे कि ऐसा कैसे हो सकता है कि हम तो ख़ुद को ढाल ही नहीं पाते हैं तो क्या हम बुद्धिमान नहीं हुए। अजीब आदमी लोग थे सब जबरदस्ती पर आ गए, उनमें से कुछ तो किताबें लिखकर, कवितायें सुनाकर, नाटक दिखाकर परिस्थितियों को ही बदलने लगे। वो ख़ुद को तो नहीं ढाल पाये, पर अपने अनुसार परिस्थितियों को ही ढाल दिया, और ख़ुद को बुद्धिमान कहा। और इस तरह नई परिभाषा बनी कि, आप जितनी चतुराई और सतर्कता से अपने आपको विपरीत परिस्थितियों में तेजी से ढाल लेते हैं या फ़िर जितनी चतुराई और सतर्कता से विपरीत परिस्थितियों को ही अपने अनुसार ढाल देते हैं आप उतने ही बुद्धिमान कहलाते हैं॥
ये विद्वता और बुद्धिमता दो अलग-अलग चीज होती है, पर देखने में एक जैसे ही लगती है । हो सकता हो कि अपने पिछले जन्म में दोनों जुड़वां बहने रही हों। अन्तर जानने के लिए हम कह सकते हैं कि मनमोहनजी के पास विद्वताजी हैं और लालूजी के पास बुद्धिमताजी । इसीलिए किसी को कमजोर नहीं कह सकते हैं, पर हाँ एक बात है कि अगर आपपर विद्वता कि कृपा है तो बुद्धिमता पा सकते हैं मगर बुद्धिमता की ज्यादा कृपा हो गई तो पता नहीं आपमें विद्वता आ पाये या नहीं। ऐसा इसलिए की बुद्धिमता की महिमा अपरम्पार है । ये बहुत ही चतुर हुआ करती है, सारी बातें चुटकियों में समझ जाए, बोलने में भी चतुराई दिखाए और हर परिस्थितियों में ढल जाए, ऐसी इनकी विशेषता हुआ करती है। दरअसल ऐसा माना जाता था कि अगर आप जितनी चतुराई और सतर्कता से अपने आपको विपरीत परिस्थितियों में भी तेजी से ढाल लेते हैं, आप उतने ही बुद्धिमान कहलाते हैं। फ़िर हुआ क्या कि विद्वान लोग हो-हल्ला मचाने लगे कि ऐसा कैसे हो सकता है कि हम तो ख़ुद को ढाल ही नहीं पाते हैं तो क्या हम बुद्धिमान नहीं हुए। अजीब आदमी लोग थे सब जबरदस्ती पर आ गए, उनमें से कुछ तो किताबें लिखकर, कवितायें सुनाकर, नाटक दिखाकर परिस्थितियों को ही बदलने लगे। वो ख़ुद को तो नहीं ढाल पाये, पर अपने अनुसार परिस्थितियों को ही ढाल दिया, और ख़ुद को बुद्धिमान कहा। और इस तरह नई परिभाषा बनी कि, आप जितनी चतुराई और सतर्कता से अपने आपको विपरीत परिस्थितियों में तेजी से ढाल लेते हैं या फ़िर जितनी चतुराई और सतर्कता से विपरीत परिस्थितियों को ही अपने अनुसार ढाल देते हैं आप उतने ही बुद्धिमान कहलाते हैं॥
Thursday, October 2, 2008
धुम्रपान पर प्रतिबंध का नियम कितना प्रभावकारी
आज बापू के जन्मदिवस की शुभकामनाओं में समूचे देश को एक नियम का सौगात मिला है और हम उस नियम का स्वागत करते हैं। आज से सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान करना कानूनी तौर पर अपराध माना जायेगा और धूम्रपान करने वालों को २०० रूपये जुर्माना भी हो जायेगा। अपने फिक्र को धुएँ में उडाने वाले आज से संभल कर रहें, कम से कम ऐसे हालत मत पैदा करें कि दूसरों को धुएँ की फिक्र होने लगे। पर सवाल है कि क्या यह नियम प्रभावकारी हो पायेगा? हो सकता है कि लोग अब भी खुलेआम धूम्रपान करे और अगर गलती से पकड़े गए तो १०-२० रूपये में छूट जाएँ । हमारी पुलिस विभाग को बहुत ही तैयार और ईमानदार होने की जरूरत है। मुझे इससे कोई मतलब नहीं कि ये नियम कितना प्रभावकारी होता है मगर मैं समझता हूँ कि ये नियम बहुत ही सार्थक है। अभी तक अगर आप किसी के धूम्रपान से परेशान भी होते तो आप उसे टोकने में हिचक सकते थे कि पता नहीं वह क्या जवाब दे, वो आपकी भावनाओं का निरादर भी कर सकता था । परन्तु अब आपके साथ ये नियम रहेगा, इसलिए कम से कम ये नियम इतना प्रभावकारी तो जरूर है।
आज के किशोरों की जिन्दगी धुएँ में सिसकती जा रही है , किशोर तनाव ( dipression) के कारण, समूह में एक-दूसरे की देखा-देखी, अपने को अलग दिखाने की प्रवृति(egoism) के कारण धूम्रपान की आदत डाल लेते है जिसे फिर दूर करना उनके लिए मुश्किल हो जाता है। समस्या ये है कि वो छिपकर ये कार्य करते हैं, और उसे ग्लानी भी महसूस नहीं होती है । इसका कारण है कि वो अपने पसंदीदा स्टारों को परदे पर कश लेते हुए देखता है , सुंदर विज्ञापनों में यही देखता है और इससे भी ज्यादा वह सार्वजनिक जगहों पर वह अपने शिक्षकों और अभिभावकों को भी धूम्रपान करते हुए पाता है । फ़िर उसे लगता है कि ये कोई ग़लत नहीं है , अभी उम्र कम है छिपकर पी लेता हूँ और दो साल बाद खुलेआम पिया करूंगा । और इस तरह वह एक भयानक लत से पीड़ित हो जाता है । इस तरह धूम्रपान प्रतिबंध का नियम शायद किशोरों को यह भी अवगत करा दे कि ये एक अपराध है तो जरूर किशोरों में धूम्रपान की समस्या कम हो जायेगी और उनका किशोरापन धुएँ में सिसकने से भी बच जायेगा ।
आज के किशोरों की जिन्दगी धुएँ में सिसकती जा रही है , किशोर तनाव ( dipression) के कारण, समूह में एक-दूसरे की देखा-देखी, अपने को अलग दिखाने की प्रवृति(egoism) के कारण धूम्रपान की आदत डाल लेते है जिसे फिर दूर करना उनके लिए मुश्किल हो जाता है। समस्या ये है कि वो छिपकर ये कार्य करते हैं, और उसे ग्लानी भी महसूस नहीं होती है । इसका कारण है कि वो अपने पसंदीदा स्टारों को परदे पर कश लेते हुए देखता है , सुंदर विज्ञापनों में यही देखता है और इससे भी ज्यादा वह सार्वजनिक जगहों पर वह अपने शिक्षकों और अभिभावकों को भी धूम्रपान करते हुए पाता है । फ़िर उसे लगता है कि ये कोई ग़लत नहीं है , अभी उम्र कम है छिपकर पी लेता हूँ और दो साल बाद खुलेआम पिया करूंगा । और इस तरह वह एक भयानक लत से पीड़ित हो जाता है । इस तरह धूम्रपान प्रतिबंध का नियम शायद किशोरों को यह भी अवगत करा दे कि ये एक अपराध है तो जरूर किशोरों में धूम्रपान की समस्या कम हो जायेगी और उनका किशोरापन धुएँ में सिसकने से भी बच जायेगा ।
Monday, September 22, 2008
सी.ई.ओ. की हत्या एक उभरती चेतावनी
आज की एक ख़बर ने भारतीय उद्योग जगत का चेहरा दुनिया में शर्मशार किया है। अगर किसी कारखाने में व्यवस्था और कामगारों के बीच हाथापायी भी हो जाए तो ये उस देश की उद्योग नीति की कमजोरी को उजागर कर देती है परन्तु यहाँ तो मामला हत्या की हो गयी है। जिस तरह राजधानी दिल्ली के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र ग्रेटर नोएडा में इलेक्ट्रोनिक्स कंपनी के सी.ई.ओ. को असंतुष्ट कर्मचारियों ने मार-पीट कर हत्या कर दी है उससे विश्व में भारतीय उद्योग की निंदा जरूर होगी। अब कोई भी बहुराष्ट्रीय कंपनी भारत में उद्योग स्थापित करने से पहले जरूर सोचेगी और शायद हिचकिचाए भी। इससे पहले सिंगुर-विवाद ने भी एक बहुत ग़लत प्रभाव छोड़ा था और अब ये ज्वलंत मामला। क्या हमारे देश में उद्योगों के लिए कोई व्यवथित नियम नहीं है कि आम जनता को हर समय नियम और कानून अपने हाथों में लेना पड़ता है।
एल.के.चौधरी ने तो बस अपने शीर्ष प्रशासन के हुक्म पर अमल किया होगा और उसे अपनी जान से हाथ धोनी पडी। उनके परिवार को इस कठिन घडी में मेरी सहानुभूति है मगर हम इस मामले को एक ही पहलू से नहीं देख सकते। आख़िर कामगारों के अत्यधिक गुस्से का कारण इतना आसान नहीं हो सकता, कहीं न कहीं प्रशासन भी गुनाहगार है । तो क्या इन नीजी कंपनियों के लिए कोई पक्के नियम और क़ानून नहीं है सरकार की ओर से जो ये अपनी मनमानी करते हैं। अगर ऐसा नहीं है तो ये सी.ई.ओ.की मौत सरकार को एक चेतावनी है कि नीजी उद्योगों में हस्तक्षेप करे। आख़िर उस मुनाफा का किसी को क्या लाभ जिसमें जान ही चली जाए। साथ ही साथ इस घटना की कड़ी निंदा होनी चाहिए और दोषी कर्मचारियों को उचित दंड भी मिलना चाहिए जिससे उद्योग जगत के अनुशासन तोड़ने वालों को भी सरकार की ओर से चेतावनी मिल जायेगी।
एल.के.चौधरी ने तो बस अपने शीर्ष प्रशासन के हुक्म पर अमल किया होगा और उसे अपनी जान से हाथ धोनी पडी। उनके परिवार को इस कठिन घडी में मेरी सहानुभूति है मगर हम इस मामले को एक ही पहलू से नहीं देख सकते। आख़िर कामगारों के अत्यधिक गुस्से का कारण इतना आसान नहीं हो सकता, कहीं न कहीं प्रशासन भी गुनाहगार है । तो क्या इन नीजी कंपनियों के लिए कोई पक्के नियम और क़ानून नहीं है सरकार की ओर से जो ये अपनी मनमानी करते हैं। अगर ऐसा नहीं है तो ये सी.ई.ओ.की मौत सरकार को एक चेतावनी है कि नीजी उद्योगों में हस्तक्षेप करे। आख़िर उस मुनाफा का किसी को क्या लाभ जिसमें जान ही चली जाए। साथ ही साथ इस घटना की कड़ी निंदा होनी चाहिए और दोषी कर्मचारियों को उचित दंड भी मिलना चाहिए जिससे उद्योग जगत के अनुशासन तोड़ने वालों को भी सरकार की ओर से चेतावनी मिल जायेगी।
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