कभी-कभी मुझे इस कलम पर आश्चर्य होने लगता है। जो बात मुझे भी पता नहीं रहती है,उसे भी ये लिख देती है, व्यक्त कर देती है। कभी-कभी तो बहुत आश्चर्य हो जाता है, जो ये कलम लिख देती है वह होने लगता है। हँसिये-हँसिये आपको लग रहा होगा कि ये पागल लेखक अपनी फंतासी की दुनिया में है। पिछले ही दिनों की घटना है, एक हँसी का मुकाबला था IIT में, मैंने एक हास्य कविता तैयार की थी। उस कविता के अंत में मैंने चीते का IIT में नामांकन करा दिया था। पता नहीं मेरी कविता से कितने लोग हंस पाये मगर एक घटना जरूर हुई, जिस समय मैं अपनी कविता सुना रहा था उसी समय एक चीता संस्थान परिसर में छात्रों द्बारा देखा गया। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ, क्योंकि चार साल से तो यहाँ कोई चीता नहीं था, या हो सकता है कि देखनेवाले का भ्रम हो। मगर ये बात IIT कि हवा में अब भी है कि चीता उसी वक्त देखा गया था। मगर शायद किसी ने ध्यान नही दिया मेरी कविता पर (वैसे भी कवि के कलम पर कौन विश्वास करता है) सिवाय मेरे एक कलाकार मित्र स्नेहिल गौतम के जिन्होंने बार-बार कहा कि ये चीता आपकी ही कविता से निकला है। मैं तो मजाक में हंस दिया था, लेकिन अभी सोच रहा हूँ कि कहीं सही में तो ऐसा नहीं होता है। इसी को लेकर मुझे आश्चर्य है अपनी कलम पर।
अगर कोई भावुक लोग गलती से इसे पढ़े तो इसे गंभीरता से न लें, बहुत दिनों से कुछ लिखा नहीं था इसीलिए बक-बक लिख दिया।
Wednesday, November 11, 2009
Thursday, October 8, 2009
विदेश मत जाओ पारो
मेरी प्रिये पारो
बहुत बहुत प्यार!!
मैं देवदास हूँ, सब कुशल-मंगल है, आशा करता हूँ कि तू भी कुशल ही होगी। चुन्नीलाल कल मदिरालय में मिला था, मुझसे कह रहा था कि पारो हारवर्ड कालेज पढने लंदन जा रही है। सुनकर मुझे बहुत दुःख हुआ, और इसी दुःख में बहुत सारा मदिरा पी गया। कल मैं इतने नशे में था कि चंद्रमुखी भी अपने कमरे में नही घुसने दी। सारी रात मैं बाहर ही भटकता रहा और चाँद के ऊपर दाग देखकर 'चाँद जैसी लड़की' को याद करता रहा। सच पारो, कल मैं बहुत रोया था, पूरा Night-out मारा हूँ और सुबह-सवेरे तुम्हें प्रेम-पत्र लिख रहा हूँ। ये पत्र भी मैं फूटपाथ से ही लिख रहा हूँ, आशा करता हूँ कि तुम्हें पसंद आएगी। मुझे आशा कम विश्वास बहुत है कि पत्र पढ़कर तुम मुझसे मिलने जरूर आओगी। आओगी न पारो? हाँ आओगी, मुझे पता है । वैसे तुम लंदन पढ़ाई करने क्यों जा रही हो, मत जाओ, अअअ अच्छी जगह नहीं है। अरे मैंने भी तो दस साल हारवर्ड में पढ़ाई की थी, की थी कि नहीं उंउं...क्या बना मैं, एक सुट्टेबाज और मदिराबाज, और क्या? देखो पारो, मैं दस साल तक लंदन में था, और तुम मेरा इंतजार करती रही, अपने दिए को हवा के झोंको में भी जलाकर रखा था। अब तुम जा रही हो, मैं क्या जलाऊंगा तुम्हारी याद में उंउं...मेरे पास तो बस सिगरेट...हाँ सिगरेट है। देखो मैं सिगरेट को बुझने नही दूँगा, डाक्टर ने चुन्नी भाई को बताया था कि मुझे कैंसर हो गया है। तुम कहीं एक साल भी लंदन में पढ़ लोगी तो ये सिगरेट तो नहीं बुझेगा मगर मममैं बुझ जाऊंगा। मुझे बचा लो पारो....विदेश मत जाओ पारो....मुझे बचा लो प प पारो।
तुम्हारे प्यार का मारा
देवदास 'बेचारा'
-ये आज प्रेम पत्र लेखन प्रतियोगिता "दिल से" में मैंने लिखा था जिसका विषय था कि विदेश पढने जा रही प्रेमी/प्रेमिका को प्रेम-पत्र लिख कर रोकने का प्रयास करो-
बहुत बहुत प्यार!!
मैं देवदास हूँ, सब कुशल-मंगल है, आशा करता हूँ कि तू भी कुशल ही होगी। चुन्नीलाल कल मदिरालय में मिला था, मुझसे कह रहा था कि पारो हारवर्ड कालेज पढने लंदन जा रही है। सुनकर मुझे बहुत दुःख हुआ, और इसी दुःख में बहुत सारा मदिरा पी गया। कल मैं इतने नशे में था कि चंद्रमुखी भी अपने कमरे में नही घुसने दी। सारी रात मैं बाहर ही भटकता रहा और चाँद के ऊपर दाग देखकर 'चाँद जैसी लड़की' को याद करता रहा। सच पारो, कल मैं बहुत रोया था, पूरा Night-out मारा हूँ और सुबह-सवेरे तुम्हें प्रेम-पत्र लिख रहा हूँ। ये पत्र भी मैं फूटपाथ से ही लिख रहा हूँ, आशा करता हूँ कि तुम्हें पसंद आएगी। मुझे आशा कम विश्वास बहुत है कि पत्र पढ़कर तुम मुझसे मिलने जरूर आओगी। आओगी न पारो? हाँ आओगी, मुझे पता है । वैसे तुम लंदन पढ़ाई करने क्यों जा रही हो, मत जाओ, अअअ अच्छी जगह नहीं है। अरे मैंने भी तो दस साल हारवर्ड में पढ़ाई की थी, की थी कि नहीं उंउं...क्या बना मैं, एक सुट्टेबाज और मदिराबाज, और क्या? देखो पारो, मैं दस साल तक लंदन में था, और तुम मेरा इंतजार करती रही, अपने दिए को हवा के झोंको में भी जलाकर रखा था। अब तुम जा रही हो, मैं क्या जलाऊंगा तुम्हारी याद में उंउं...मेरे पास तो बस सिगरेट...हाँ सिगरेट है। देखो मैं सिगरेट को बुझने नही दूँगा, डाक्टर ने चुन्नी भाई को बताया था कि मुझे कैंसर हो गया है। तुम कहीं एक साल भी लंदन में पढ़ लोगी तो ये सिगरेट तो नहीं बुझेगा मगर मममैं बुझ जाऊंगा। मुझे बचा लो पारो....विदेश मत जाओ पारो....मुझे बचा लो प प पारो।
तुम्हारे प्यार का मारा
देवदास 'बेचारा'
-ये आज प्रेम पत्र लेखन प्रतियोगिता "दिल से" में मैंने लिखा था जिसका विषय था कि विदेश पढने जा रही प्रेमी/प्रेमिका को प्रेम-पत्र लिख कर रोकने का प्रयास करो-
Sunday, September 20, 2009
सुपरमैन का IIT में आरक्षण
मैं सुपरमैन हूँ और भारत सरकार से IIT में आरक्षण के लिए आवेदन कर रहा हूँ। मैं बड़े समय से पूरी दुनिया में 'crime fight' कर रहा हूँ, पर कोई नौकरी नही लगी है। सुना था IIT में admission के बाद नौकरी मिल जाती है, मगर JEE में पास होना थोड़ा मुश्किल है। इसीलिए आपसे आरक्षण मांग रहा हूँ और मैं deserve करता हूँ। अगर आप जाति के आधार पर देते हैं तो मेरी 'Man' जाति सबसे दबी-कुचली है, अब केवल इस जाति में चार लोग ही बच पाये है , Batman, Spiderman, Ironman और मैं। इसीलिए आप हमें अल्पसंख्यक कहकर भी आरक्षण दे सकते हैं। मैंने सुना है आजकल 'गब्बर सिंह' भी आपसे आरक्षण मांग रहा है। वह भी कालिया और सांबा के साथ IIT में पढ़ना चाहता है, मगर आप मेरे आवेदन-पत्र पर पहले ध्यान दीजियेगा। कहा भी गया है लूटने वालों से बचाने वालों का हाथ ज्यादा लम्बा होता है। बचाने से याद आया, कि हम लोगों को बचाते रहते हैं, यहाँ-वहाँ मचाते रहते हैं , तो इसका मतलब ये नहीं कि बहुत शक्तिशाली हैं। अरे शक्तिशाली तो आपकी सरकार है, हम बेचारे तो मीडिया हैप के शिकार हैं। हमारे पास तो एक गर्ल-फ्रेंड भी नहीं है। पता है,पता है IIT में बहुत कम गर्ल है,कोई बात नहीं एडजस्ट कर जाऊंगा, मगर अपनी बेरोजगारी नहीं सह पाऊंगा। कभी भी जॉब नहीं मिली है, कभी रिपोर्टर, कभी कैमरामैन, कभी जॉब से बाहर ,यहाँ-वहाँ भटकता ही रहा हूँ मैं। अब IIT से डिग्री लेकर आराम से कोई छोटा-मोटा जॉब करना चाहता हूँ, फ़िर गर्ल-फ्रेंड मिल जायेगी, शादी हो जायेगी, छोटे-छोटे बच्चे होंगे, वे भी IIT में पढेंगे,वे भी छोटे-मोटे जॉब करेंगे और आपको ढेर सारी दुआएं देंगे...
अरे,अरे क्या कहरहे हैं आप! एक ही सीट बचा है आरक्षण के कोटा में, तो फिर वह सीट मुझे ही दे दीजिये। देखिये Batman और Ironman तो बड़ा ही रईस लोग है, करोड़पति है,उसे आरक्षण की क्या जरूरत है । रही बात Spiderman की तो वह छोटा-मोटा जॉब थोड़े ही करेगा, उसके चाचाजी ने उससे कहा था 'Great power comes with great job'। मेरे तो कोई चाचाजी भी नही थे , इसीलिए ये सीट आप मुझे दे दीजिये ।
आपका सुपरमैन
अरे,अरे क्या कहरहे हैं आप! एक ही सीट बचा है आरक्षण के कोटा में, तो फिर वह सीट मुझे ही दे दीजिये। देखिये Batman और Ironman तो बड़ा ही रईस लोग है, करोड़पति है,उसे आरक्षण की क्या जरूरत है । रही बात Spiderman की तो वह छोटा-मोटा जॉब थोड़े ही करेगा, उसके चाचाजी ने उससे कहा था 'Great power comes with great job'। मेरे तो कोई चाचाजी भी नही थे , इसीलिए ये सीट आप मुझे दे दीजिये ।
आपका सुपरमैन
Sunday, March 15, 2009
कवि /कलाकार अक्सर ऐसा क्यों करते हैं?
पता नही ऐसा क्यों, मगर आप कितने भी बड़े कवि को बड़े-बड़े मंचों पर सुनेंगे तो यही लगेगा कि वे पुराना प्रदर्शन ही दोहरा रहे हैं। हाल ही में जो कवि-सम्मलेन हुआ था उनके कलाकार पहले भी सन्स्थान में आए हुए थे, सब बातें नई और चुटीली कर रहे थे लेकिन कविता वही सुनाने लगते थे जो पहले भी सुनाकर गए थे। एक दर्शक की पीड़ा से ज्यादा तो कवि ख़ुद समझते होंगे क्योंकि वे तो अक्सर कई सम्मेलनों में जाते हैं, इसीलिए उन्हें जो भी कविता सुनने को मिलती होगी वे पहले ही उसे सुन चुके होते होंगे। तब तो वह इस दर्द को बखूबी समझते होंगे लेकिन जब वही मंच पर जाते हैं तो इस दर्द पर मलहम लगाना तो दूर, इसे जिन्दा करने लगते हैं। दरअसल उनकी कोई गलती नहीं होती है, गलती तो उनके अंदर का वो कलाकार कर देता है जिसे उसकी पुरानी कला ने मोह-पाश में बाँध रखा है। अब कलाकार तो कोमल होता है, वह अपनी पुरानी कला को नाराज़ नहीं कर सकता है न, इसीलिए ये गलती कर बैठता है । ऐसी बात नही होती है कि ये कवि या कलाकार होनहार नही होते या ये कुछ नया नहीं लिखते हैं। दरअसल ये बहुत नई रचनाओं का सृजन करते हैं मगर नई रचनाओं को प्रस्तुत करके अपनी छवि को खोने का हौवा सताता है। ये कवि अपनी छवि नही खोना चाहते हैं। क्या होगा कहीं ये नई रचना जनता को पसंद नहीं आए या शायद इस भीड़ में ज्यादा लोग तो मुझे पहली बार सुन रहे हैं, उन्हें तो पुरानी वाली रचना जरूर सुनानी चाहिए। शायद इस तरह के प्रश्न उठते होंगे उनके दिमाग में ...
अब दिमाग से याद आया कि इसकी संरचना बहुत ही जटिल होती है, अनेक कोशिका, अनेक तंत्रिका, जिनमें से कुछ जुड़े-जुड़े होते हैं और कुछ अलग-अलग होते हैं। सीखने की प्रक्रिया में ये शायद हमारी मदद करती है। अब कला भी एक सीखने की ही प्रक्रिया है, जिसमे अभ्यास की दरकार होती है। जब शुरू-शुरू में कला का जूनून सवार होता है तो हम उसका बहुत अभ्यास करते हैं और जितना अभ्यास करते हैं उतने ही मजबूत तरीके से दिमाग की कोशिकाएं जुड़कर उस ख़ास कला के मार्ग का निर्माण कर देती है। अब हम यहाँ-वहाँ मंच ढूंढते हैं और हममें से कुछ भाग्यशाली लोग अपनी कला के प्रशंसक को पा लेते हैं। कुछ दिनों बाद एक छवि बन जाती है अब हमारा काम बढ़ जाता है और अब छवि को भी संभालकर रखना है। इसीलिए एक बार चमकने के बाद जो कला का निर्माण हम करते हैं शायद पहली की तरह सख्त नही हो पाती, मेरा मतलब दिमाग कि कोशिकाएं उसके लिए कम मजबूती से जुड़ती होंगी। इसीलिए जब भी हम मंच पर जायेंगे, नए प्रदर्शन के लिए मन में डर आएगा और हम फ़िर से पुराने प्रदर्शन की ही पुनरावृति करेंगे ।
अब दिमाग से याद आया कि इसकी संरचना बहुत ही जटिल होती है, अनेक कोशिका, अनेक तंत्रिका, जिनमें से कुछ जुड़े-जुड़े होते हैं और कुछ अलग-अलग होते हैं। सीखने की प्रक्रिया में ये शायद हमारी मदद करती है। अब कला भी एक सीखने की ही प्रक्रिया है, जिसमे अभ्यास की दरकार होती है। जब शुरू-शुरू में कला का जूनून सवार होता है तो हम उसका बहुत अभ्यास करते हैं और जितना अभ्यास करते हैं उतने ही मजबूत तरीके से दिमाग की कोशिकाएं जुड़कर उस ख़ास कला के मार्ग का निर्माण कर देती है। अब हम यहाँ-वहाँ मंच ढूंढते हैं और हममें से कुछ भाग्यशाली लोग अपनी कला के प्रशंसक को पा लेते हैं। कुछ दिनों बाद एक छवि बन जाती है अब हमारा काम बढ़ जाता है और अब छवि को भी संभालकर रखना है। इसीलिए एक बार चमकने के बाद जो कला का निर्माण हम करते हैं शायद पहली की तरह सख्त नही हो पाती, मेरा मतलब दिमाग कि कोशिकाएं उसके लिए कम मजबूती से जुड़ती होंगी। इसीलिए जब भी हम मंच पर जायेंगे, नए प्रदर्शन के लिए मन में डर आएगा और हम फ़िर से पुराने प्रदर्शन की ही पुनरावृति करेंगे ।
Sunday, February 8, 2009
सोचने के लिए हम किस भाषा का प्रयोग करते हैं?
मैं जानता हूँ कि आपका जवाब हिन्दी ही होगा और हो सकता है कि आप हिन्दी में ही सोचते हों मगर क्या इसका मतलब हम ये मान लें कि हम अपनी मातृभाषा में ही सोचते हैं। बहुदा मैंने बहुत लोगों के मुंह से ये कहते सुना है कि अमुक भाषा से तो मुझे सम्बन्ध रखना ही है, आख़िर हम सोचते तो अमुक भाषा में ही हैं। मैंने बहुत जगह हिन्दी प्रचार में भी सुना है कि आइये हिन्दी से जुडें, क्यूंकि सोचते तो हम हिन्दी में ही हैं। दरअसल इनका कहना होता है कि हम कितने भी दूसरी भाषा या विदेशी भाषा का प्रयोग जीवन में कर लें सोचने के लिए अपनी मातृभाषा का ही प्रयोग करते हैं। शायद इनका कहना सही भी हो मगर इस लेख में मैं एक अलग मत प्रस्तुत कर रहा हूँ।
सबसे सच बात ये है कि हमारे दिमाग पर वो भाषा हावी होती है जो भाषा बाजार में प्रयोग होती है। आजकल के जीवन में बाज़ार एक अहम् स्थान रखता है और प्रचार-प्रसार माध्यमों के बढ़ जाने से ये हमारे जीवन के निकटतम होता जा रहा है। इसीलिए हमारे सोच पर ये बाज़ार की भाषा हावी हो जाती है, अब भला बाज़ार में ' INDIA SHINING' के नारे चले तो भला कोई भारतवासी क्यूँ सोचेगा कि भारत चमक रहा है। इसी तरह आज के समय हमारे बाज़ार में जो भी स्लोगन है अधिकतर अंग्रेजी में है फ़िर ये सोचना कि हम सोचने के लिए मातृभाषा का इस्तेमाल करते होंगे, थोड़ी सी नाइंसाफी है। ये तो छोटी सी बात हुई, एक बड़ी बात ये भी है कि हमारे यहाँ का एक बड़ा सा भाग पढाई-लिखाई करता है, और सामान्यतः बड़ी पढाई के लिए अंगरेजी माध्यम का ही इस्तेमाल करता है। अब इस भाषा पर हमारा कैरियर निर्भर करता है, इसी भाषा में हमें विचार विक्सित (Idea development) करने हैं, तो भला आप बताएं कि हमारे सोचने की भाषा क्या हो सकती है, निश्चित तौर पर कहीं न कहीं यहाँ भी बाज़ार किसी रूप में प्रभाव डाल रहा है।
इसके अलावा हमारे सोच पर वो भाषा भी बहुत प्रभाव डालती है जो हमारी इन्द्रियों के सबसे करीब हो, और आज के युग में हमारी इन्द्रियों को सबसे ज्यादा प्रभावित करने के साधनों में से एक है इन्टरनेट , और इन्टरनेट की भाषा भी हमारे सोच पर असर डालती है। ये तो गूगल को धन्यवाद कहना होगा कि थोडी-बहुत हिन्दी-प्रयोग इन्टरनेट पर हो जाती है और इसलिए हमलोग हिन्दी में भी सोच लेते हैं। एक और साधन भी है मीडिया और चलचित्र, साधारनतया हम चलचित्र जिस भाषा की देखने की शौक रखते हैं, उसी भाषा के डायलोग और गाने हमारे दिमाग में चलने लगते हैं और फ़िर उस भाषा में सोचने से कोई मातृभाषा नहीं रोक सकती है। दूसरी बात भी सही ही है कि जिस भाषा के मीडिया का इस्तेमाल करेंगे उसी भाषा में तर्क और प्रश्न हमारे मन में उठेंगे । और भी बहुत सारे साधन और माध्यम हैं जो हमारी सोच और भाषा को प्रभावित करती है , लेकिन हर किसी का सम्बन्ध बाज़ार से जुड़ा हुआ रहता है।
इसीलिए हम सोचने के लिए मातृभाषा से ज्यादा अपने बाज़ार की भाषा का प्रयोग करते हैं !!
सबसे सच बात ये है कि हमारे दिमाग पर वो भाषा हावी होती है जो भाषा बाजार में प्रयोग होती है। आजकल के जीवन में बाज़ार एक अहम् स्थान रखता है और प्रचार-प्रसार माध्यमों के बढ़ जाने से ये हमारे जीवन के निकटतम होता जा रहा है। इसीलिए हमारे सोच पर ये बाज़ार की भाषा हावी हो जाती है, अब भला बाज़ार में ' INDIA SHINING' के नारे चले तो भला कोई भारतवासी क्यूँ सोचेगा कि भारत चमक रहा है। इसी तरह आज के समय हमारे बाज़ार में जो भी स्लोगन है अधिकतर अंग्रेजी में है फ़िर ये सोचना कि हम सोचने के लिए मातृभाषा का इस्तेमाल करते होंगे, थोड़ी सी नाइंसाफी है। ये तो छोटी सी बात हुई, एक बड़ी बात ये भी है कि हमारे यहाँ का एक बड़ा सा भाग पढाई-लिखाई करता है, और सामान्यतः बड़ी पढाई के लिए अंगरेजी माध्यम का ही इस्तेमाल करता है। अब इस भाषा पर हमारा कैरियर निर्भर करता है, इसी भाषा में हमें विचार विक्सित (Idea development) करने हैं, तो भला आप बताएं कि हमारे सोचने की भाषा क्या हो सकती है, निश्चित तौर पर कहीं न कहीं यहाँ भी बाज़ार किसी रूप में प्रभाव डाल रहा है।
इसके अलावा हमारे सोच पर वो भाषा भी बहुत प्रभाव डालती है जो हमारी इन्द्रियों के सबसे करीब हो, और आज के युग में हमारी इन्द्रियों को सबसे ज्यादा प्रभावित करने के साधनों में से एक है इन्टरनेट , और इन्टरनेट की भाषा भी हमारे सोच पर असर डालती है। ये तो गूगल को धन्यवाद कहना होगा कि थोडी-बहुत हिन्दी-प्रयोग इन्टरनेट पर हो जाती है और इसलिए हमलोग हिन्दी में भी सोच लेते हैं। एक और साधन भी है मीडिया और चलचित्र, साधारनतया हम चलचित्र जिस भाषा की देखने की शौक रखते हैं, उसी भाषा के डायलोग और गाने हमारे दिमाग में चलने लगते हैं और फ़िर उस भाषा में सोचने से कोई मातृभाषा नहीं रोक सकती है। दूसरी बात भी सही ही है कि जिस भाषा के मीडिया का इस्तेमाल करेंगे उसी भाषा में तर्क और प्रश्न हमारे मन में उठेंगे । और भी बहुत सारे साधन और माध्यम हैं जो हमारी सोच और भाषा को प्रभावित करती है , लेकिन हर किसी का सम्बन्ध बाज़ार से जुड़ा हुआ रहता है।
इसीलिए हम सोचने के लिए मातृभाषा से ज्यादा अपने बाज़ार की भाषा का प्रयोग करते हैं !!
Friday, December 5, 2008
शहरों के बच्चे ज्यादा तेज क्यों ?
दरअसल इस ब्लॉग पर मैं समसामयिक विषयों पर विचार व्यक्त करता रहता था, मगर समसामयिक घटनाओं में ऐसी-ऐसी उथल-पुथल मचने लगी कि वक़्त की राजनीति मेरे समझ से बाहर हो गयी। अब भला इतने लोग इस्तीफे-उस्तीफे दे रहे हैं, कहीं भी कुछ भी हो रहा है, अब कैसे समझ में आए कि क्या हो रहा है ? अभी तो मैं एक छात्र ठहरा, इसीलिए सोचा कि शिक्षा और विषयों पर ही कुछ लिखना शुरु करता हूँ।
सचमुच में कहें तो इस वक़्त शिक्षा भी सरकार के सामने एक विकट समस्या है, खासकर अपने राज्य बिहार के बारे में तो मूझे जानकारी है। गाँव-गाँव में स्कूल खुले हुए हैं, मगर पढने को छात्र नहीं आते हैं, इसपर सरकार ने मध्याहन काल में भोजन भी रखा, स्कूल में शिक्षकों की संख्या काफी बढायी और तब जाकर छात्र आते हैं। सामान्यतः देखा जाता है कि शहरों के बच्चे गाँव के बच्चों की तुलना में पढायी-लिखाई में ज्यादा सफल होते हैं, इसका कारण लोग पैसा समझ लेटे हैं। एक तरह से यही कारण होता है मगर जब गाँव में भी इतनी सुविधा दे दी जाती है तब भी परिणाम यही निकलता है। अगर गाँव का कोई पराक्रमी शिक्षक जी-जान भी लगा देता है तो चंद प्रतिभाओं को ही स्वरुप दे पाता है जबकि शहरों के बच्चों पर इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ती है। इसका कारण हमारे प्रवृति के गर्भ में छिपा है। दरअसल ये सीखने की प्रवृति बहुत कुछ माहौल और वातावरण पर निर्भर करता है जो कि शहरों के बच्चों के लिए सुलभ हो जाता है। हमारे सीखने और समझने की प्रवृति मुख्यतः तीन तरह की होती है: सुनकर समझना, अभ्यास से समझना, कल्पनाशक्ति से समझना। अभ्यास से समझने में परिश्रम की दरकार होती है जिससे हर बचपन हिचकता है। जहाँ तक सुनकर समझने और कल्पनाशक्ति का सवाल है तो ये दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, कुछ लोग सीखने के लिए पहले शब्दों को सुनकर समझ लेते हैं और फ़िर उसपर बार-बार मन में कल्पना करके सीख लेते हैं। जबकि दूसरे लोग उन्हीं सुने हुए शब्दों को तभी समझ पाते हैं जब उनके बारे में कुछ कल्पना कर पाते हैं । जैसे अगर आप दूसरे तरह के लोग हैं तो आप मेरे इस लेख को तभी समझ पायेंगे अगर आपको हिन्दी से अच्छी तरह परिचित होंगे और इस लेख के भारी शब्दों से परिचित होंगे अन्यथा आपको समझाना टेढी खीर है। इसका अर्थ ये हुआ कि आपको बहुत ज्यादा समझदार होने के लिए बहुत ज्यादा शब्दों का मतलब जानना जरूरी है।
अब हम लेख पर फिर से वापस आ जाते हैं कि क्यों शहरों के छात्र ज्यादा तेज हो जाते हैं। शहरों में अभिभावक गांवों की तुलना में अपने बच्चों से ज्यादा बातें करते हैं, जिससे बच्चे ज्यादा शब्दों के जानकार हो जाते हैं। उनके पास समाचार पत्र , पत्रिकाएं, कॉमिक्स, किताबें ज्यादा से ज्यादा उपलब्ध रहती है, जिससे वे ज्यादा शब्दों की जानकारी हासिल कर लेते हैं। वहाँ बिजली की सुविधा ज्यादा होती है, जिससे टेलीविजन पर चलने वाले शो, न्यूज, कार्टून, फ़िल्म भी ज्यादा शब्दों को सीखने में मदद कर देते हैं। इनसब कारणों से हम अनुमान लगा सकते हैं कि एक दस साल का बच्चा जो पांचवीं पास करता है, अगर वह शहर का है तो उसके पास पाँच सौ गुना ज्यादा शब्दों की अधिक जानकारी है। अब अगर उस बच्चे को कुछ सिखाना हो तो उसे सीखने और समझने में ज्यादा आसानी होगी, जबकि गाँव के बच्चे को सिखाने में आपको भी तकलीफ ही होगी। बचपन का दस साल कुछ अनोखा होता है, उस वक्त सीखे गए शब्द आपपर अनोखा प्रभाव छोड़ता है, वे आपके प्राकृतिक मित्र बन जाते हैं। बचपन में जिस चीज में आपकी रूचि बन जाती है वही आपके जीवन पर अमिट प्रभाव छोड़ती है, शायद इसका भी उपर्युक्त कारण ही होता है । इसीलिए अगर सरकार गाँव-गाँव में शिक्षा का प्रचार-प्रसार कर रही है तो उसका मकसद वहाँ के छात्रों को तेज-तर्रार भी बनाना होना चाहिए। वहाँ सार्वजनिक पुस्तकालय, वाचनालय की व्यवस्था होनी चाहिए, बिजली जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध होनी चाहिए, तब जाकर गांवों के बच्चे भी शहरों के बच्चों की तरह तेज बन पायेंगे।
सचमुच में कहें तो इस वक़्त शिक्षा भी सरकार के सामने एक विकट समस्या है, खासकर अपने राज्य बिहार के बारे में तो मूझे जानकारी है। गाँव-गाँव में स्कूल खुले हुए हैं, मगर पढने को छात्र नहीं आते हैं, इसपर सरकार ने मध्याहन काल में भोजन भी रखा, स्कूल में शिक्षकों की संख्या काफी बढायी और तब जाकर छात्र आते हैं। सामान्यतः देखा जाता है कि शहरों के बच्चे गाँव के बच्चों की तुलना में पढायी-लिखाई में ज्यादा सफल होते हैं, इसका कारण लोग पैसा समझ लेटे हैं। एक तरह से यही कारण होता है मगर जब गाँव में भी इतनी सुविधा दे दी जाती है तब भी परिणाम यही निकलता है। अगर गाँव का कोई पराक्रमी शिक्षक जी-जान भी लगा देता है तो चंद प्रतिभाओं को ही स्वरुप दे पाता है जबकि शहरों के बच्चों पर इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ती है। इसका कारण हमारे प्रवृति के गर्भ में छिपा है। दरअसल ये सीखने की प्रवृति बहुत कुछ माहौल और वातावरण पर निर्भर करता है जो कि शहरों के बच्चों के लिए सुलभ हो जाता है। हमारे सीखने और समझने की प्रवृति मुख्यतः तीन तरह की होती है: सुनकर समझना, अभ्यास से समझना, कल्पनाशक्ति से समझना। अभ्यास से समझने में परिश्रम की दरकार होती है जिससे हर बचपन हिचकता है। जहाँ तक सुनकर समझने और कल्पनाशक्ति का सवाल है तो ये दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, कुछ लोग सीखने के लिए पहले शब्दों को सुनकर समझ लेते हैं और फ़िर उसपर बार-बार मन में कल्पना करके सीख लेते हैं। जबकि दूसरे लोग उन्हीं सुने हुए शब्दों को तभी समझ पाते हैं जब उनके बारे में कुछ कल्पना कर पाते हैं । जैसे अगर आप दूसरे तरह के लोग हैं तो आप मेरे इस लेख को तभी समझ पायेंगे अगर आपको हिन्दी से अच्छी तरह परिचित होंगे और इस लेख के भारी शब्दों से परिचित होंगे अन्यथा आपको समझाना टेढी खीर है। इसका अर्थ ये हुआ कि आपको बहुत ज्यादा समझदार होने के लिए बहुत ज्यादा शब्दों का मतलब जानना जरूरी है।
अब हम लेख पर फिर से वापस आ जाते हैं कि क्यों शहरों के छात्र ज्यादा तेज हो जाते हैं। शहरों में अभिभावक गांवों की तुलना में अपने बच्चों से ज्यादा बातें करते हैं, जिससे बच्चे ज्यादा शब्दों के जानकार हो जाते हैं। उनके पास समाचार पत्र , पत्रिकाएं, कॉमिक्स, किताबें ज्यादा से ज्यादा उपलब्ध रहती है, जिससे वे ज्यादा शब्दों की जानकारी हासिल कर लेते हैं। वहाँ बिजली की सुविधा ज्यादा होती है, जिससे टेलीविजन पर चलने वाले शो, न्यूज, कार्टून, फ़िल्म भी ज्यादा शब्दों को सीखने में मदद कर देते हैं। इनसब कारणों से हम अनुमान लगा सकते हैं कि एक दस साल का बच्चा जो पांचवीं पास करता है, अगर वह शहर का है तो उसके पास पाँच सौ गुना ज्यादा शब्दों की अधिक जानकारी है। अब अगर उस बच्चे को कुछ सिखाना हो तो उसे सीखने और समझने में ज्यादा आसानी होगी, जबकि गाँव के बच्चे को सिखाने में आपको भी तकलीफ ही होगी। बचपन का दस साल कुछ अनोखा होता है, उस वक्त सीखे गए शब्द आपपर अनोखा प्रभाव छोड़ता है, वे आपके प्राकृतिक मित्र बन जाते हैं। बचपन में जिस चीज में आपकी रूचि बन जाती है वही आपके जीवन पर अमिट प्रभाव छोड़ती है, शायद इसका भी उपर्युक्त कारण ही होता है । इसीलिए अगर सरकार गाँव-गाँव में शिक्षा का प्रचार-प्रसार कर रही है तो उसका मकसद वहाँ के छात्रों को तेज-तर्रार भी बनाना होना चाहिए। वहाँ सार्वजनिक पुस्तकालय, वाचनालय की व्यवस्था होनी चाहिए, बिजली जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध होनी चाहिए, तब जाकर गांवों के बच्चे भी शहरों के बच्चों की तरह तेज बन पायेंगे।
Friday, November 28, 2008
आतंक का रूप, कितना कुरूप
पिछले ४८ घंटों से पूरा मुंबई आतंक के साए से सहमा हुआ है, और उस साए को पूरी तरह से हटने का अब भी इंतजार कर रहा है । इस वक़्त माहौल में दहशत दिखता है तो सड़कों पर सूनापन सा, लोगों ने अपने टी.वी.चैनल पिछले दो दिनों से बंद नहीं किया है और कुलाबा और नरीमन का इलाका किसी युद्धक्षेत्र में बदल चुका है। मुझे ९३ का बमकांड तो याद नहीं है मगर जब से याद है आतंक का ये रूप सबसे ज्यादा कुरूप है । 'डाई हार्ड' जैसी प्रसिद्ध चलचित्रों में ही ऐसे दहशत देखे थे पर वास्तविकता में ऐसी स्थिति सोचना कल्पना से परे लगता है। केवल दो दर्जन लोगों ने पूरे देश को भयभीत कर दिया है और इस दो दिनों में ही पूरे देश का नक्शा बदल कर रख दिया है, अब इससे ज्यादा कुरूप दृश्य और क्या हो सकता है। पुलिस के तीन सुपर जांबाज़ जो कि अखबारों की सनसनी रहते थे अब वे काल के गाल में समा गए। क्रिकेट के दो वन-डे और चैंपियन ट्रोफी टी-२० का रद्द होना ही ये बतला रहा है कि हमारे और भी बहुत सारे महत्वपूर्ण कार्य रद्द हो चुके होंगे। पूरे दुनिया के मीडिया इस वक़्त मुंबई को ही समाचार बनाए हुई है, इससे हमारा बाजार और पर्यटन कितना चौपट होगा वो तो समय बतायेगा। भारत की छवि को तो इन दो दर्जन लोगों ने तो बदल कर रख दिया, मगर इन्हें बचने का भी हक़ नहीं होना चाहिए । एक बात प्रशसा के योग्य है कि भारत भी अब अमेरिका, ब्रिटेन, रूस की तरह किसी भी समझौते से इनकार कर अन्तिम कार्रवायी कर रहा है। जबकि प्रशंसा और भी तब होगी जब भारत भी आतंकवाद के ख़िलाफ़ वही रूख अपनाए जो अमेरिका ने ९/११ के बाद अपनाई थी .
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