नागपंचमी का दिन था ,नाग-पूजा की तैयारी जोरों से चल रही थी । मैं अपने दोस्तो के साथ बैठा हुआ था, हमलोग एक यज्ञ करने वाले थे । तभी विचार उठा की क्यों नही नाग देवता को ही ढूँढकर लाया जाये ,साक्षात नाग-देवता विद्यमान रहेंगे तो पूजा-आरती का अपना ही महत्व होगा । सबकी हाँ में हाँ मिल गयी और सबने सहमति जता दी । अब समस्या थी कि नाग-देव को ढूँढें कहाँ ? फिर भी हमलोग बगीचे की ओर चल पड़े और शायद किस्मत भी अच्छी थी ,एक काला सा नाग कुंडली मारे हुए एक पेड के नीचे बैठा था । अब भगवान के इतने जल्दी दर्शन हो जायेंगे हमलोगों ने कल्पना भी नही की थी । सोचा कि दंडवत हो लूं ,मगर और लोगों को खडे देखा तो इरादा मन में ही रख लिया । अब बारी थी कि कौन नाग-देवता के पास जाकर आग्रह करे कि आज वे अपना गुस्सा त्यागकर हमारा आतिथ्य स्वीकार करें । एक दोस्त ने हिम्मत बटोरा ये सोचकर कि आज तो नाग पूजा है ,नागजी कुछ नही कहेंगे । पर पत्तों की सरसराहट ने नाग-देव की तन्द्रा भंग कर दी ,और उनका फन लहलहाने लगा ,जीभ लपलपाने लगा और वह फूंफकार उठा ,मेरे दोस्त ने वापस हमारी ओर दौड़ लगा दी पर गिर पड़ा । नाग-देव नागपंचमी से बेखबर फूंफकारते हुए बढ़ रहे थे । शायद अब सेकेंडों में दोस्त का काम तमाम करने ही वाला था और हमलोग बेबस दूर से डरे हुए देख रहे थे । तभी अचानक एक नेवला आ गया ,और नाग-देव पर बुरी तरह से टूट पड़ा । हमलोग हक्के-बक्के देख रहे थे कि कैसे उसके शौर्य और पराक्रम के आगे नाग-देव की एक नही चली और नाग-देव टुकड़े -टुकड़े हो गए । नेवला जीत के बाद विजय-जश्न मनाने की जगह वहीं सुस्ताने लगा था .
सारे मित्र हतप्रभ थे और उदास भी, कि अब पूजा कैसे होगी ? मगर एक दोस्त ने सुझाव दिया कि क्यों ना इसी नेवला की धूमधाम से पूजा की जाये ,आख़िर इसने अपनी जान बचायी है । और तर्क भी दिया गया कि शक्तिशाली की हमेशा पूजा की जाती है और बचानेवाला ही देवता माना जाता है । फिर क्या था इरादा झटपट बदल दिया गया और हमलोग नेवला को पकड़ने लगे ,वह इतना थका था कि भाग भी नही पाया मगर हमने समझा कि उन्हें हमारा आमंत्रण स्वीकार है । यज्ञ मंडप को सजाया गया ,अग्नि कुण्ड को सुलगाया गया और नेवला को सजाकर वहाँ बैठाया गया । जय नेवला ,जय नेवला ,जय नेवला देवा ... नाग को ये मार दे संत प्रभुदेवा ... उच्चारण से वातावरण गूंजने लगा । हमलोगों को बहुत मजा आ रहा था और फैसला करने लगा था मन ही मन कि अब हर साल नेवला-पंचमी ही मनाएंगे । पर उधर नेवला महाराज को पता नही ये सब रास आ रहा था या नही ,वो तो आग की गरमी से तपा जा रहा था और उपर से चारों ओर से लोग घेरे हुये थे । डर के मारे उसकी सिट्टी -पिट्टी गुम थी ,फिर भी इज्जत का अहसास किसे नही हो जाता है । नेवला को भी भनक मिल चुका था कि उसकी इज्जत की जा रही है,शायद ये आदमी लोग इतने भी बुरे नही होते हैं जितना उसने सोच रखा था । पर उसे तपाकर आदमी लोगों को क्या मिलने वाला है और ये लोग कितने असभ्य तरीके से शोर मचा रहे हैं । सच पूछिए तो नेवला को कुछ भी रास नही आ रहा था ,अगर कुछ उसे उम्मीद थी तो बस लड्डू की उस थाली से ,जिसकी सुगंध शुरू से ही उसके जीभ में लालच पैदा कर रही थी। पर हाय रे किस्मत ,पूजा भी खत्म हुआ ,आरती भी खत्म हुई और लोग लड्डू की थाली उठा लिए । अब लड्डू की थाल पर हमारे दोस्त झपट रहे थे ,बस नेवला देव से यही बर्दास्त नही हो पाया और उछल-कूद मचाने लगे। बस फिर क्या था किसी के पाँव की ठोकर लग गयी और वो गरम कुण्ड में जा गिरे । उसके बाद अपने झुलसे जिस्म को लेकर वह कहाँ चले गए ,हमलोगों ने आशीर्वाद लेने के लिए उन्हें बहुत ढूँढा मगर वह साल भर तक दिखायी नही दिए । बीच-बीच में नागजी दिखते रहे मगर नेवला के दर्शन दुर्लभ हो चुके थे । आखिरकार नाग-देव को भी मनाना था,इसलिये नाग-पूजा ही फिर शुरू करना पड़ा ,और अब भी हमलोग नाग-पंचमी ही मनाते हैं । ।
Friday, October 12, 2007
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1 comments:
मेरे ब्लाग पर आने के लिए धन्यवाद।आईआईटी मुंबई में मेरा भाई भी है, रजत देशपांडे, फाइनल इयर में है। अभी हालैंड वगैरह गया था। आप जानते है उसे क्या।
शुभकामनाएं
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