Wednesday, October 17, 2007

हिंदी लेखन में रोमांच का अनुभव

सचमुच इस अंग्रेजीकरण के दौर में भी अगर हिंदी के इतने सारे चिट्ठे इस विश्वजाल पर देखता हूँ ,तो हिंदी लेखन का रोमांच समझ में आ जाता है । कोई राष्ट्र-भक्ति या भाषा-प्रेम के नाम पर कब तक हिंदी की सेवा करता रहेगा ,ये तो इस अदभूत भाषा का जादू है कि जिसे एक बार सम्मोहित कर लेता है उसे इस भाषा को अपनाना पड़ ही जाता है । इस मोहिनी भाषा के जाल में एक बार फंस जाने पर या तो उससे प्यार करोगे या ग़ुस्सा ,कम से कम उसकी अवहेलना करना तो मुश्किल हो जाता है।
अब हमारे ही संस्थान में दो मीडिया बॉडी है ,एक "इनसैट" अन्ग्रेज़ी मासिक निकालता है और और दूसरा "आवाज़" जो कि हिंदी मासिक निकालता है । अब हम तकनीकी संस्थान के छात्र हैं ,अंग्रेजी जरूरत है और हिंदी की जरूरत तो तकनीक को है ही नहीं । इसलिये "इनसैट" में लिखना प्रमाण-पत्र के समान हो जाता है मगर हिंदी में लिखना लोग प्रमाण-पत्र नही मानते । फिर भी हिंदी लिखने वालों की संख्या कम नही है और आवाज़ छपता ही आ रहा है । अब तक तो मैं भी इसके सम्पादकीय मंडल में कार्य करने लगा हूँ । इसी बीच की बात है ,मेरे एक दोस्त ने कहा कि उसे भी आवाज़ के लिए लिखना है । मैंने चुटकी ली कि शायद उसे प्रमाण-पत्र की जरूरत है । इसपर उसने झिड़क दिया कि अगर उसे प्रमाण-पत्र की जरूरत होती तो "इनसैट" में लिख लेता ,उसे हिंदी लिखने में रोमांच का अनुभव होता है ,इसीलिये वह मुझसे बोल रहा है । खैर मैंने तो सबसे पहले उसे टीम में शामिल कर लिया ,और फिर इस विषय पर सोचने लगा कि सचमुच मैं भी तो शायद रोमांच ही अनुभव करता हूँ इसीलिये इस भाषा से खुद को अलग नही कर पाता हूँ । कभी इसी पर प्यार तो कभी ग़ुस्सा दिखा देता हूँ ,मगर अवहेलना नहीं कर पाता हूँ ।

1 comments:

anuradha srivastav said...

हिन्दी में लिखना, यानि अपनी मातृभाषा में लिखना रोमांचक तो होगा ही ।