Saturday, October 20, 2007
विश्वजाल पर बढ़ता हिन्दी प्रयोग
सर्वप्रथम विश्वजाल (इंटरनेट ) से मेरा परिचय यही कोई ४-५ साल पहले हुआ था ,जब मैं रांची जैसे शहरों में आया था और पढायी से मन ऊबने लगा था । याहू चैट का जो रंग-ढंग था वो तो मूझे बहुत भाने लगा ,लेकिन विडंबना देखो कि इंटरनेट केवल अंग्रेजी ही जानती थी । मैंने अपने खास दोस्तों को अपनी समस्या बतायी कि यार केवल अंग्रेजी में चैट करके बोर हो जाता हूँ ,इसपर दोस्त हंसने लगे थे कि हिन्दी में भी तो कर सकते हो । सच मानिए तो मुझे यकीन नही हुआ था ,तब उस दोस्त के साथ सायबर कैफे गया और जहाँ तक याद है की खर्च भी मूझे ही देना पड़ा था । आख़िर मुझे सीखना था कि हिन्दी में कैसे चैट करते हैं ,मन में अजीब सी हलचल थी । मेरा दोस्त स्क्रीन पर बैठा और मैं बगल में एक अच्छे शिष्य की भांति ,अब वो चैट खोलकर लिखने लगा ,नमस्कार (एन ए एम ए एस के ए आर ) और मेरा दिमाग ठनका कि ये मैं क्यों नही सोच पाया था । अपने मूर्ख बनने के गम को छिपाते हुए मैंने अपने दोस्त की बहुत प्रशंसा की और उसे बताया भी कि ये तकनीक समझना बहुत बड़ी योग्यता है। इतना पर भी मेरा मन नही माना ,किसी को वो मेरी मूर्खता बताये नही उसकी तारीफ करते हुए उसे समोसे भी खिलाये । लेकिन सच पूछिए उसके बाद से मैं हिन्दी को रोमन में ही लिखता रहा । उसपर से अंग्रेजी माध्यम में पढायी करना ,कालांतर में तो मैं लेखनी से भी रोमन में ही हिन्दी को लिखने लगा ।इस तरह हिन्दी में लिखना भी भूल सा गया था शायद ,पर इन दिनों विश्वजाल पर जिस तरह हिन्दी का प्रयोग बढ़ता जा रहा है ,उससे हिन्दी लिखने की आदत फिर से पड़ने लगी है । मैं ये उम्मीद करता हूँ कि इस तरह अनेक हिन्दी-प्रेमी युवा जो उच्च शिक्षा से जुड़े होंगे इससे लाभान्वित हुए होंगे । अब आगे अगर हिन्दी में डोमेनों का भी इंटरनेट पर प्रयोग होने लगे तो हिन्दी प्रसार के क्षेत्र में बहुत फायदा होगा ।
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1 comments:
तुमने जो कुछ भी कहा ये हकीकत है। मैं भी इसका अनुभव कर चुकीं हूँ जब मेरी बेटी ने हास्टल से मुझे लेटर लिखा वो भी रोमन हिन्दी में।
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