सचमुच आज विज्ञान और तकनीकी ने इस तरह हमपर अधिकार कर लिया है कि हम भावनाओं को बिल्कुल ही भूलते जा रहे हैं । मगर भावना कुछ ऎसी चीजों में आ जाती है जिसे मनुष्य खुद से जुदा नही कर सकता । और हाँ इसे हम अलग नही कर पाए हैं बल्कि हमारी भावनाओं को तकनीक ने उधार ले लिया है । आज किस तरह हमारी भावनाएं अंतर्जाल (इंटरनेट ) पर ही सिमट कर रह गयी है और वास्तविक जीवन में हम कितने प्रैक्टिकल हो गए हैं ये देखकर शायद आप भी हमारी बात स्वीकारने में नही झिझकेंगे । मगर इसमें हमारी या तकनीक की कोई ग़लती नही है ,ये तो परिवर्तन के साथ होना ही था । आज भाग-दौड़ की जिन्दगी में अगर आप भावना या संवेदना को महत्व देने लगेंगे शायद आपको कुछ मुश्किल हो सकता है ,इसलिए आप भाव्नाविहीन हो कर रहते हैं वास्त विक जिन्दगी में । मगर भावना तो आपकी मजबूरी है उसे आप छिपा सकते नहीं और यही कारण है कि अन्तेर्जाल पर आप भावुक और संवेदनशील हो जाते हैं । आज भी आप ओरकुट के अल्बमों को चेक कर लें तो आप किसी की भी भावना परख सकते हैं मगर वही उससे आप सीधे बातचीत कीजिए तो उसे कभी नही समझ सकते हैं । हकीकत में आपको कोई बुरा भी कह देगा तो आजकल शायद उतना बुरा नही लगता है मगर वही अंतर्जाल पर कुछ कह दे तो आप भड़क सकते हैं । अब इस पर ज्यादा लिखना नही चाहता मगर देखना चाहूंगा कि ये तकनीक इंसान को कितना संवेदनहीन बनाएगा । दिनकर की एक पंक्ति यार आ रही है...
जब-जब मस्तिष्क विजय होता संसार ज्ञान से चलता है
मानवता की राह ह्रदय तू यह संदेश सुनाता चल...
Thursday, November 8, 2007
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1 comments:
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