Tuesday, October 23, 2007
मेरी लेखन रूचि
मैं जब भी लिखने कुछ बैठता हूँ ,समझ नहीं पाता हूँ की आख़िर लिखूं क्या ? कोई कविता या कहानी ,कोई व्यंग या कोई लेख । कुल मिलाकर समझ लीजिये की पूरे ऊहापोह में रहता हूँ और मूझे सबसे ज्यादा डर रहता है आलोचकों की टिप्पणियों से । पता नहीं कब किस बात को लेकर मूझे कठघरे में खड़ा कर दे ,और यही हिचक और डर मेरे कलम की जुबानों को उलझाए रहती है । इसका मतलब ये नही कि मैं अपने प्रशंसकों से खुश रहता हूँ ,उनसे भी मैं चिढ जाता हूँ कि जरूर उसने अच्छे से पढा नहीं होगा और मूझे खुश करना चाहता है । अब आप सोचेंगे कि मैं अजीब किस्म का लेखक हूँ तो आप बिल्कुल सही हैं ,लिखने में रूचि होने के बाबजूद मैं लिखने से ज्यादा पढना पसंद करता हूँ। पर जब वहाँ भी टिप्पणी की बारी आती है तो मेरा कलम रूक रूक कर चलने लगता है ,कि कहीं मैं आलोचना तो नही कर रहा हूँ और आलोचना गलत तो नहीं जो लेखक को नाराज़ न कर दे । इसीलिए प्रशंसा ही कर देता हूँ ,मगर सच पूछिए तो मेरे अन्दर एक आलोचक छिपा हुआ है जो किसी लेख की प्रशंसा करना ही नही चाहता बल्कि उसपर प्रहार करना चाहता है । परन्तु प्रहार सही है या गलत सोचते हुए प्रशंसा ही कर देता है । अब देखते हैं कब मैं अपनी रूचि पर अमल करते हुए कलम को स्वतंत्र कर पाता हूँ ।
Saturday, October 20, 2007
विश्वजाल पर बढ़ता हिन्दी प्रयोग
सर्वप्रथम विश्वजाल (इंटरनेट ) से मेरा परिचय यही कोई ४-५ साल पहले हुआ था ,जब मैं रांची जैसे शहरों में आया था और पढायी से मन ऊबने लगा था । याहू चैट का जो रंग-ढंग था वो तो मूझे बहुत भाने लगा ,लेकिन विडंबना देखो कि इंटरनेट केवल अंग्रेजी ही जानती थी । मैंने अपने खास दोस्तों को अपनी समस्या बतायी कि यार केवल अंग्रेजी में चैट करके बोर हो जाता हूँ ,इसपर दोस्त हंसने लगे थे कि हिन्दी में भी तो कर सकते हो । सच मानिए तो मुझे यकीन नही हुआ था ,तब उस दोस्त के साथ सायबर कैफे गया और जहाँ तक याद है की खर्च भी मूझे ही देना पड़ा था । आख़िर मुझे सीखना था कि हिन्दी में कैसे चैट करते हैं ,मन में अजीब सी हलचल थी । मेरा दोस्त स्क्रीन पर बैठा और मैं बगल में एक अच्छे शिष्य की भांति ,अब वो चैट खोलकर लिखने लगा ,नमस्कार (एन ए एम ए एस के ए आर ) और मेरा दिमाग ठनका कि ये मैं क्यों नही सोच पाया था । अपने मूर्ख बनने के गम को छिपाते हुए मैंने अपने दोस्त की बहुत प्रशंसा की और उसे बताया भी कि ये तकनीक समझना बहुत बड़ी योग्यता है। इतना पर भी मेरा मन नही माना ,किसी को वो मेरी मूर्खता बताये नही उसकी तारीफ करते हुए उसे समोसे भी खिलाये । लेकिन सच पूछिए उसके बाद से मैं हिन्दी को रोमन में ही लिखता रहा । उसपर से अंग्रेजी माध्यम में पढायी करना ,कालांतर में तो मैं लेखनी से भी रोमन में ही हिन्दी को लिखने लगा ।इस तरह हिन्दी में लिखना भी भूल सा गया था शायद ,पर इन दिनों विश्वजाल पर जिस तरह हिन्दी का प्रयोग बढ़ता जा रहा है ,उससे हिन्दी लिखने की आदत फिर से पड़ने लगी है । मैं ये उम्मीद करता हूँ कि इस तरह अनेक हिन्दी-प्रेमी युवा जो उच्च शिक्षा से जुड़े होंगे इससे लाभान्वित हुए होंगे । अब आगे अगर हिन्दी में डोमेनों का भी इंटरनेट पर प्रयोग होने लगे तो हिन्दी प्रसार के क्षेत्र में बहुत फायदा होगा ।
Wednesday, October 17, 2007
हिंदी लेखन में रोमांच का अनुभव
सचमुच इस अंग्रेजीकरण के दौर में भी अगर हिंदी के इतने सारे चिट्ठे इस विश्वजाल पर देखता हूँ ,तो हिंदी लेखन का रोमांच समझ में आ जाता है । कोई राष्ट्र-भक्ति या भाषा-प्रेम के नाम पर कब तक हिंदी की सेवा करता रहेगा ,ये तो इस अदभूत भाषा का जादू है कि जिसे एक बार सम्मोहित कर लेता है उसे इस भाषा को अपनाना पड़ ही जाता है । इस मोहिनी भाषा के जाल में एक बार फंस जाने पर या तो उससे प्यार करोगे या ग़ुस्सा ,कम से कम उसकी अवहेलना करना तो मुश्किल हो जाता है।
अब हमारे ही संस्थान में दो मीडिया बॉडी है ,एक "इनसैट" अन्ग्रेज़ी मासिक निकालता है और और दूसरा "आवाज़" जो कि हिंदी मासिक निकालता है । अब हम तकनीकी संस्थान के छात्र हैं ,अंग्रेजी जरूरत है और हिंदी की जरूरत तो तकनीक को है ही नहीं । इसलिये "इनसैट" में लिखना प्रमाण-पत्र के समान हो जाता है मगर हिंदी में लिखना लोग प्रमाण-पत्र नही मानते । फिर भी हिंदी लिखने वालों की संख्या कम नही है और आवाज़ छपता ही आ रहा है । अब तक तो मैं भी इसके सम्पादकीय मंडल में कार्य करने लगा हूँ । इसी बीच की बात है ,मेरे एक दोस्त ने कहा कि उसे भी आवाज़ के लिए लिखना है । मैंने चुटकी ली कि शायद उसे प्रमाण-पत्र की जरूरत है । इसपर उसने झिड़क दिया कि अगर उसे प्रमाण-पत्र की जरूरत होती तो "इनसैट" में लिख लेता ,उसे हिंदी लिखने में रोमांच का अनुभव होता है ,इसीलिये वह मुझसे बोल रहा है । खैर मैंने तो सबसे पहले उसे टीम में शामिल कर लिया ,और फिर इस विषय पर सोचने लगा कि सचमुच मैं भी तो शायद रोमांच ही अनुभव करता हूँ इसीलिये इस भाषा से खुद को अलग नही कर पाता हूँ । कभी इसी पर प्यार तो कभी ग़ुस्सा दिखा देता हूँ ,मगर अवहेलना नहीं कर पाता हूँ ।
अब हमारे ही संस्थान में दो मीडिया बॉडी है ,एक "इनसैट" अन्ग्रेज़ी मासिक निकालता है और और दूसरा "आवाज़" जो कि हिंदी मासिक निकालता है । अब हम तकनीकी संस्थान के छात्र हैं ,अंग्रेजी जरूरत है और हिंदी की जरूरत तो तकनीक को है ही नहीं । इसलिये "इनसैट" में लिखना प्रमाण-पत्र के समान हो जाता है मगर हिंदी में लिखना लोग प्रमाण-पत्र नही मानते । फिर भी हिंदी लिखने वालों की संख्या कम नही है और आवाज़ छपता ही आ रहा है । अब तक तो मैं भी इसके सम्पादकीय मंडल में कार्य करने लगा हूँ । इसी बीच की बात है ,मेरे एक दोस्त ने कहा कि उसे भी आवाज़ के लिए लिखना है । मैंने चुटकी ली कि शायद उसे प्रमाण-पत्र की जरूरत है । इसपर उसने झिड़क दिया कि अगर उसे प्रमाण-पत्र की जरूरत होती तो "इनसैट" में लिख लेता ,उसे हिंदी लिखने में रोमांच का अनुभव होता है ,इसीलिये वह मुझसे बोल रहा है । खैर मैंने तो सबसे पहले उसे टीम में शामिल कर लिया ,और फिर इस विषय पर सोचने लगा कि सचमुच मैं भी तो शायद रोमांच ही अनुभव करता हूँ इसीलिये इस भाषा से खुद को अलग नही कर पाता हूँ । कभी इसी पर प्यार तो कभी ग़ुस्सा दिखा देता हूँ ,मगर अवहेलना नहीं कर पाता हूँ ।
Sunday, October 14, 2007
एक लैन दो कौंप--बहुत नाइंसाफी है
ये लेख मैं अपने सन्स्थान के हिंदी मासिक अखबार 'आवाज़' के लिखी थी...पढने वालों ने बहुत पसंद किया था ...
एक छोटा सा कमरा,जिनमें दो छोटी-छोटी जिंदगियां और दोनो की छोटी-छोटी तमन्नायें,उन्ही तमन्नाओं में एक दिन टकराव होता है और हम उस टकराव के कारण का पता लगाने निकलते हैं। तब जो एक समस्या खुलकर सामने आती है,वह एक म्यान दो तलवार से मिलती-जुलती प्रतीत होती है ,तो चलिए समस्या की गहरायी में पैठ लगाकर देखते हैं ।
मेरे पड़ोस के ही कमरे में दो मित्र थे,दोनो एम.आई. के लिए काम करते थे । अब एम.आई इतना बड़ा सांस्कृतिक मेला है ,सी.जी.बनने का मन सबको हो जाता है और दोनो एक ही विभाग में काम भी करते थे । अतः दोनो को अपने विभाग के सी.जी. को प्रभावित करने के लिए अपने-अपने कौंप पर infinite (अत्यधिक) काम करने पड़ते थे । अब कमरे की हालत या तो कमरा ही बताये या उस कमरे के लैन का वो तार जिनकी खिंचायी होती रहती थी लगातार और झंझट होते थे जिनके लिए दिन में पचास बार । अब ये सी.जी. कौन बना हम पता कर ही सकते हैं पर सोच रहा हूँ कि उस लैन के तार का क्या हुआ होगा ?विश्वासपात्र सूत्रों से पता चला है कि उसकी हालत वही हुई जो इस वक़्त उन दोनो के जिगरी दोस्ती कि है ...
अब ये समझाना तो कठिन ही होगा कि इस एक लैन दो कौंप प्रणाली से कितने रिश्ते-नाते प्रभावित हुये हैं ,फिर भी बताने लायक एक और मामला है जो कि बहुत आम है । मेरे एक परम मित्र हुआ करते थे,उनका एक कन्या से दिल का मामला था । मामला तो ये भी था कि उनके कक्ष सहपाठी भी उन्ही कन्या पर फिदा थे । उधर कन्या नेट पर उपस्थित होती थी और इधर लैन का तार सनसनाता हुआ उसके साथी के कौंप में प्रविष्ट कर जाता था । मेरे मित्र संकोची स्वभाव के थे ,भावनाओं को तो रोक लेते थे मगर कमरे में नही रूक पाते थे। उनकी विपत्ति के वो क्षण मेरे कमरे में बीता करते थे और उनका भरपूर फायदा उठाते हुए मैं ना जाने कितनी दर्द भरी कविताओं की पोटली उस दौरान उन्हें दवा के रुप में पिला दिया करता था । इन सबका असर ये रहा कि कालांतर में उनका अपने कमरे से दुराव बढ़ता चला गया । अब तक तो वो कमरा भी बदल चुका है और उनके दिल के इरादे भी जो कभी किसी के लिए हुआ करते थे ।
एक छोटा सा कमरा,जिनमें दो छोटी-छोटी जिंदगियां और दोनो की छोटी-छोटी तमन्नायें,उन्ही तमन्नाओं में एक दिन टकराव होता है और हम उस टकराव के कारण का पता लगाने निकलते हैं। तब जो एक समस्या खुलकर सामने आती है,वह एक म्यान दो तलवार से मिलती-जुलती प्रतीत होती है ,तो चलिए समस्या की गहरायी में पैठ लगाकर देखते हैं ।
मेरे पड़ोस के ही कमरे में दो मित्र थे,दोनो एम.आई. के लिए काम करते थे । अब एम.आई इतना बड़ा सांस्कृतिक मेला है ,सी.जी.बनने का मन सबको हो जाता है और दोनो एक ही विभाग में काम भी करते थे । अतः दोनो को अपने विभाग के सी.जी. को प्रभावित करने के लिए अपने-अपने कौंप पर infinite (अत्यधिक) काम करने पड़ते थे । अब कमरे की हालत या तो कमरा ही बताये या उस कमरे के लैन का वो तार जिनकी खिंचायी होती रहती थी लगातार और झंझट होते थे जिनके लिए दिन में पचास बार । अब ये सी.जी. कौन बना हम पता कर ही सकते हैं पर सोच रहा हूँ कि उस लैन के तार का क्या हुआ होगा ?विश्वासपात्र सूत्रों से पता चला है कि उसकी हालत वही हुई जो इस वक़्त उन दोनो के जिगरी दोस्ती कि है ...
अब ये समझाना तो कठिन ही होगा कि इस एक लैन दो कौंप प्रणाली से कितने रिश्ते-नाते प्रभावित हुये हैं ,फिर भी बताने लायक एक और मामला है जो कि बहुत आम है । मेरे एक परम मित्र हुआ करते थे,उनका एक कन्या से दिल का मामला था । मामला तो ये भी था कि उनके कक्ष सहपाठी भी उन्ही कन्या पर फिदा थे । उधर कन्या नेट पर उपस्थित होती थी और इधर लैन का तार सनसनाता हुआ उसके साथी के कौंप में प्रविष्ट कर जाता था । मेरे मित्र संकोची स्वभाव के थे ,भावनाओं को तो रोक लेते थे मगर कमरे में नही रूक पाते थे। उनकी विपत्ति के वो क्षण मेरे कमरे में बीता करते थे और उनका भरपूर फायदा उठाते हुए मैं ना जाने कितनी दर्द भरी कविताओं की पोटली उस दौरान उन्हें दवा के रुप में पिला दिया करता था । इन सबका असर ये रहा कि कालांतर में उनका अपने कमरे से दुराव बढ़ता चला गया । अब तक तो वो कमरा भी बदल चुका है और उनके दिल के इरादे भी जो कभी किसी के लिए हुआ करते थे ।
Friday, October 12, 2007
हमलोग नाग-पंचमी क्यों मनाते हैं ?
नागपंचमी का दिन था ,नाग-पूजा की तैयारी जोरों से चल रही थी । मैं अपने दोस्तो के साथ बैठा हुआ था, हमलोग एक यज्ञ करने वाले थे । तभी विचार उठा की क्यों नही नाग देवता को ही ढूँढकर लाया जाये ,साक्षात नाग-देवता विद्यमान रहेंगे तो पूजा-आरती का अपना ही महत्व होगा । सबकी हाँ में हाँ मिल गयी और सबने सहमति जता दी । अब समस्या थी कि नाग-देव को ढूँढें कहाँ ? फिर भी हमलोग बगीचे की ओर चल पड़े और शायद किस्मत भी अच्छी थी ,एक काला सा नाग कुंडली मारे हुए एक पेड के नीचे बैठा था । अब भगवान के इतने जल्दी दर्शन हो जायेंगे हमलोगों ने कल्पना भी नही की थी । सोचा कि दंडवत हो लूं ,मगर और लोगों को खडे देखा तो इरादा मन में ही रख लिया । अब बारी थी कि कौन नाग-देवता के पास जाकर आग्रह करे कि आज वे अपना गुस्सा त्यागकर हमारा आतिथ्य स्वीकार करें । एक दोस्त ने हिम्मत बटोरा ये सोचकर कि आज तो नाग पूजा है ,नागजी कुछ नही कहेंगे । पर पत्तों की सरसराहट ने नाग-देव की तन्द्रा भंग कर दी ,और उनका फन लहलहाने लगा ,जीभ लपलपाने लगा और वह फूंफकार उठा ,मेरे दोस्त ने वापस हमारी ओर दौड़ लगा दी पर गिर पड़ा । नाग-देव नागपंचमी से बेखबर फूंफकारते हुए बढ़ रहे थे । शायद अब सेकेंडों में दोस्त का काम तमाम करने ही वाला था और हमलोग बेबस दूर से डरे हुए देख रहे थे । तभी अचानक एक नेवला आ गया ,और नाग-देव पर बुरी तरह से टूट पड़ा । हमलोग हक्के-बक्के देख रहे थे कि कैसे उसके शौर्य और पराक्रम के आगे नाग-देव की एक नही चली और नाग-देव टुकड़े -टुकड़े हो गए । नेवला जीत के बाद विजय-जश्न मनाने की जगह वहीं सुस्ताने लगा था .
सारे मित्र हतप्रभ थे और उदास भी, कि अब पूजा कैसे होगी ? मगर एक दोस्त ने सुझाव दिया कि क्यों ना इसी नेवला की धूमधाम से पूजा की जाये ,आख़िर इसने अपनी जान बचायी है । और तर्क भी दिया गया कि शक्तिशाली की हमेशा पूजा की जाती है और बचानेवाला ही देवता माना जाता है । फिर क्या था इरादा झटपट बदल दिया गया और हमलोग नेवला को पकड़ने लगे ,वह इतना थका था कि भाग भी नही पाया मगर हमने समझा कि उन्हें हमारा आमंत्रण स्वीकार है । यज्ञ मंडप को सजाया गया ,अग्नि कुण्ड को सुलगाया गया और नेवला को सजाकर वहाँ बैठाया गया । जय नेवला ,जय नेवला ,जय नेवला देवा ... नाग को ये मार दे संत प्रभुदेवा ... उच्चारण से वातावरण गूंजने लगा । हमलोगों को बहुत मजा आ रहा था और फैसला करने लगा था मन ही मन कि अब हर साल नेवला-पंचमी ही मनाएंगे । पर उधर नेवला महाराज को पता नही ये सब रास आ रहा था या नही ,वो तो आग की गरमी से तपा जा रहा था और उपर से चारों ओर से लोग घेरे हुये थे । डर के मारे उसकी सिट्टी -पिट्टी गुम थी ,फिर भी इज्जत का अहसास किसे नही हो जाता है । नेवला को भी भनक मिल चुका था कि उसकी इज्जत की जा रही है,शायद ये आदमी लोग इतने भी बुरे नही होते हैं जितना उसने सोच रखा था । पर उसे तपाकर आदमी लोगों को क्या मिलने वाला है और ये लोग कितने असभ्य तरीके से शोर मचा रहे हैं । सच पूछिए तो नेवला को कुछ भी रास नही आ रहा था ,अगर कुछ उसे उम्मीद थी तो बस लड्डू की उस थाली से ,जिसकी सुगंध शुरू से ही उसके जीभ में लालच पैदा कर रही थी। पर हाय रे किस्मत ,पूजा भी खत्म हुआ ,आरती भी खत्म हुई और लोग लड्डू की थाली उठा लिए । अब लड्डू की थाल पर हमारे दोस्त झपट रहे थे ,बस नेवला देव से यही बर्दास्त नही हो पाया और उछल-कूद मचाने लगे। बस फिर क्या था किसी के पाँव की ठोकर लग गयी और वो गरम कुण्ड में जा गिरे । उसके बाद अपने झुलसे जिस्म को लेकर वह कहाँ चले गए ,हमलोगों ने आशीर्वाद लेने के लिए उन्हें बहुत ढूँढा मगर वह साल भर तक दिखायी नही दिए । बीच-बीच में नागजी दिखते रहे मगर नेवला के दर्शन दुर्लभ हो चुके थे । आखिरकार नाग-देव को भी मनाना था,इसलिये नाग-पूजा ही फिर शुरू करना पड़ा ,और अब भी हमलोग नाग-पंचमी ही मनाते हैं । ।
सारे मित्र हतप्रभ थे और उदास भी, कि अब पूजा कैसे होगी ? मगर एक दोस्त ने सुझाव दिया कि क्यों ना इसी नेवला की धूमधाम से पूजा की जाये ,आख़िर इसने अपनी जान बचायी है । और तर्क भी दिया गया कि शक्तिशाली की हमेशा पूजा की जाती है और बचानेवाला ही देवता माना जाता है । फिर क्या था इरादा झटपट बदल दिया गया और हमलोग नेवला को पकड़ने लगे ,वह इतना थका था कि भाग भी नही पाया मगर हमने समझा कि उन्हें हमारा आमंत्रण स्वीकार है । यज्ञ मंडप को सजाया गया ,अग्नि कुण्ड को सुलगाया गया और नेवला को सजाकर वहाँ बैठाया गया । जय नेवला ,जय नेवला ,जय नेवला देवा ... नाग को ये मार दे संत प्रभुदेवा ... उच्चारण से वातावरण गूंजने लगा । हमलोगों को बहुत मजा आ रहा था और फैसला करने लगा था मन ही मन कि अब हर साल नेवला-पंचमी ही मनाएंगे । पर उधर नेवला महाराज को पता नही ये सब रास आ रहा था या नही ,वो तो आग की गरमी से तपा जा रहा था और उपर से चारों ओर से लोग घेरे हुये थे । डर के मारे उसकी सिट्टी -पिट्टी गुम थी ,फिर भी इज्जत का अहसास किसे नही हो जाता है । नेवला को भी भनक मिल चुका था कि उसकी इज्जत की जा रही है,शायद ये आदमी लोग इतने भी बुरे नही होते हैं जितना उसने सोच रखा था । पर उसे तपाकर आदमी लोगों को क्या मिलने वाला है और ये लोग कितने असभ्य तरीके से शोर मचा रहे हैं । सच पूछिए तो नेवला को कुछ भी रास नही आ रहा था ,अगर कुछ उसे उम्मीद थी तो बस लड्डू की उस थाली से ,जिसकी सुगंध शुरू से ही उसके जीभ में लालच पैदा कर रही थी। पर हाय रे किस्मत ,पूजा भी खत्म हुआ ,आरती भी खत्म हुई और लोग लड्डू की थाली उठा लिए । अब लड्डू की थाल पर हमारे दोस्त झपट रहे थे ,बस नेवला देव से यही बर्दास्त नही हो पाया और उछल-कूद मचाने लगे। बस फिर क्या था किसी के पाँव की ठोकर लग गयी और वो गरम कुण्ड में जा गिरे । उसके बाद अपने झुलसे जिस्म को लेकर वह कहाँ चले गए ,हमलोगों ने आशीर्वाद लेने के लिए उन्हें बहुत ढूँढा मगर वह साल भर तक दिखायी नही दिए । बीच-बीच में नागजी दिखते रहे मगर नेवला के दर्शन दुर्लभ हो चुके थे । आखिरकार नाग-देव को भी मनाना था,इसलिये नाग-पूजा ही फिर शुरू करना पड़ा ,और अब भी हमलोग नाग-पंचमी ही मनाते हैं । ।
Monday, October 8, 2007
दिल दोस्ती ई.टी.सी.
आज मैंने एक सिनेमा देखा, लोग काफी चर्चा कर रहे थे कि कालेज राजनीति से संबंधित है, इसलिये सोचा देख लेता हूँ । दिल दोस्ती ई .टी. सी. ,जी हाँ यही सिनेमा का नाम था , इसमें राजनीति कम पर युवा जीवन की सच्चाई ज्यादा देखने को मिली । सिनेमा के पोस्टर पर ही लिखा है कि अगर तुम युवा हो तो संभावनाएं असीमित है । दरअसल मूझे समझ में ये नही आया कि अगर संजय मिश्रा राजनीति में आना चाहता है तो फिर वह भावनात्मक रुप से इतना कमजोर क्यों है । इतिहास में जिसने भी राजनीति चुना है भावनात्मक रुप से मजबूत हुआ है,आप किसी का भी उदाहरण देख सकते हैं ।पर ये सिनेमा आज के युवा वर्ग की मानसिकता को बिल्कुल सही तरीके से उकेरा है । प्रेरणा उससे प्यार नही करती थी वो तो उसके लोकप्रियता से आकर्षित हुई थी । मगर जब सारे महत्वपूर्ण लोग ये कह रहे थे कि वो साधारण है ,अपूर्व महत्वपूर्ण है तो फिर मैं प्रेरणा की मानसिकता समझ सकता हूँ ,आख़िर वो भी एक लड़की थी । जहाँ तक अपूर्व की बात है तो उसे इसी बात के लिए प्रशंसा ही की जा रही थी ,यहाँ तक कि संजय के भी द्वारा ,तो फिर उसे उतना ज्यादा गलत नही ठहराया जा सकता है । शायद गलत आदमी नही ,फैसले गलत थे और संभावनाओं की असीमितता की जानकारी किसी को नही थी । इस सिनेमा में बस बताया गया है कि युवाओं को फैसले सोच-समझकर लेना चाहिए और संभावनाओं की अनदेखी नही करनी चाहिए । आखिरकार सिनेमा के अंत में किसी को कुछ नही मिला और सबने अपना सबकुछ खो दिया जो उसे मिलना चाहिए था ,और जो उसके लिए बहुत अच्छा रहता । इसीलिये युवाओं को याद रखना चाहिए की संभावनाएं असीमित है और वो सोच-समझकर फैसला लें ।
पहला पोस्ट
इस ब्लोग पर कुछ कहानी , संस्मरण ,लेख या किसी मुद्दे पर विचार डालने का प्रयास करूंगा , इससे पहले मैं केवल कवितायेँ लिखता था पर अब ब्लोगरी की दुनिया में आना चाहता हूँ ... हो सकता है कि शुरुआत इतना अच्छा नही रहे मगर कहीं से तो शुरू करना ही पड़ेगा ।
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