सचमुच आज विज्ञान और तकनीकी ने इस तरह हमपर अधिकार कर लिया है कि हम भावनाओं को बिल्कुल ही भूलते जा रहे हैं । मगर भावना कुछ ऎसी चीजों में आ जाती है जिसे मनुष्य खुद से जुदा नही कर सकता । और हाँ इसे हम अलग नही कर पाए हैं बल्कि हमारी भावनाओं को तकनीक ने उधार ले लिया है । आज किस तरह हमारी भावनाएं अंतर्जाल (इंटरनेट ) पर ही सिमट कर रह गयी है और वास्तविक जीवन में हम कितने प्रैक्टिकल हो गए हैं ये देखकर शायद आप भी हमारी बात स्वीकारने में नही झिझकेंगे । मगर इसमें हमारी या तकनीक की कोई ग़लती नही है ,ये तो परिवर्तन के साथ होना ही था । आज भाग-दौड़ की जिन्दगी में अगर आप भावना या संवेदना को महत्व देने लगेंगे शायद आपको कुछ मुश्किल हो सकता है ,इसलिए आप भाव्नाविहीन हो कर रहते हैं वास्त विक जिन्दगी में । मगर भावना तो आपकी मजबूरी है उसे आप छिपा सकते नहीं और यही कारण है कि अन्तेर्जाल पर आप भावुक और संवेदनशील हो जाते हैं । आज भी आप ओरकुट के अल्बमों को चेक कर लें तो आप किसी की भी भावना परख सकते हैं मगर वही उससे आप सीधे बातचीत कीजिए तो उसे कभी नही समझ सकते हैं । हकीकत में आपको कोई बुरा भी कह देगा तो आजकल शायद उतना बुरा नही लगता है मगर वही अंतर्जाल पर कुछ कह दे तो आप भड़क सकते हैं । अब इस पर ज्यादा लिखना नही चाहता मगर देखना चाहूंगा कि ये तकनीक इंसान को कितना संवेदनहीन बनाएगा । दिनकर की एक पंक्ति यार आ रही है...
जब-जब मस्तिष्क विजय होता संसार ज्ञान से चलता है
मानवता की राह ह्रदय तू यह संदेश सुनाता चल...
Thursday, November 8, 2007
Wednesday, November 7, 2007
कहानी जिन्दगी की
कहानी- ये शब्द सुनते ही आपके मन में पात्र और घटनाएं याद आ जाती है । सचमुच कुछ पात्र और घटनाओं का सामंजस्य ही कहानी का निर्माण करता है । कुछ मनगढ़ंत तो कुछ कहानी वास्तविक भी होती है जो किसी जीवन से संबंध रखती है । इसका मतलब ये कह सकते हैं कि कहानियां लोगों के जीवन पर आधारित होती है ,पर कभी ऐसा सुना है कि किसी का जीवन कहानियों पर आधारित हो । जी हाँ ,ऐसा मुश्किल तो है पर शायद असंभव नही कि कुछ जीवन कहानियों पर आधारित हो जाये ।कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि वो अपनी कहानी का नायक खुद को ही समझता रहता है और अंत में पता चलता है कि कहानी में तो उसकी भूमिका थी ही नही । अब मैं हद कह रहा हूँ ,भला किसी की कहानी में उसी की भूमिका कैसे नही रहेगी । चलिए मान लेता हूँ कि उसकी भी भूमिका होगी पर शायद मेहमान पात्र के जैसा उसका छोटा सा किरदार होगा । अब सोचिये वो तो अपनी कहानी का नायक मान कर चल रहा था ,अब उसपर क्या बीत रही होगी । दरअसल शायद मेरी बात कल्पना मात्र लगे पर जब जिन्दगी कहानियों पर चलने लगे तो अक्सर यही होता है । इसीलिए जीवन कहानियों पर नही बल्कि जीवन पर कहानियां आधारित होती है :)
Monday, November 5, 2007
स्वर्ण जयंती
इस साल हमारा संस्थान स्वर्ण जयंती मना रहा है ,पूरे पचास वर्ष जिसमें उसने सफलता के कई कीर्तिमान स्थापित किये हैं। और आज विश्व भर में अपनी उच्च तकनीकी के लिए जाना जाता है । नेहरु जी ने जो पचास वर्ष पहले एक सपना देखा था उसे हमने साकार कर दिखाया । ये स्वर्ण जयंती समारोह केवल अतीत की सफलताओं के लिए जश्न मनाने के लिए ही नही बल्कि भविष्य की योजनाओं को तैयार करने के उद्देश्य से भी है । शैक्षणिक जगत में बडे-बडे पहल लिए जा रहे हैं ,जैसे तकनीक के अलावा शोध पर इस बार बहुत जोर दिया जा रहा है । शोध और अनुसंधान के लिए अनेक बुनियादी सुविधाएं बधायी जा रही है । इससे शोध क्षेत्र में काफी सुधार होगा और फिर हो सकता है कि आने वाले समय में अनुसंधान के क्षेत्रों में भी जगत-प्रसिद्ध हो जाये । ये तो आनेवाला समय ही बतायेगा ,इस वक्त तो इतने प्रसिद्ध हस्ती और व्यक्तित्व हमारे संस्थान में आ रहे हैं कि हमलोग इन्ही लोगों में व्यस्त हैं ,तरह-तरह के कार्यक्रम और गजब-गजब के कलाकारों का तांता लगा हुआ है । उम्मीद है कि ये स्वर्ण जयंती वर्ष हमलोग उल्लास्पूर्वक मनाएंगे ।
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