Thursday, July 17, 2008
मासूम मन में अपराध की घुसपैठ
मैं बच्चों के मासूम मन की बात कर रहा हूँ । आजकल अधिकांस बच्चे अपने ज्यादातर समय टी०वी० देखकर बिताया करते हैं। वैसे भी अब इस विज्ञान-जगत में सामाजिकता इतनी संकुचित हो चुकी है कि लोग अकेला रहने में ही स्वतंत्रता का अनुभव करते हैं । और इसका असर बच्चों पर भी पड़ता है और वो भी अपना ज्यादा समय एकांत में ही बिताना सीख लेते हैं । और टेलीविजन ही तब एकमात्र साथी बच जाता है और यहीं से आरम्भ होता है उसके दिलो-दिमाग में अपराध की घुसपैठ । क्योंकि बच्चों को जो भी कार्टून या फिल्मों के माध्यम से परोसा जाता है उसमें अस्सी प्रतिशत अपराध की ही मिलावट होती है। हमारे बच्चे रामायण के राम से ज्यादा कार्टून के बैटमैन और सुपरमैन को ज्यादा आदर्श मानते हैं । आज संसार जिस अपराध की चिंता कर रहा है, उसके अंकुर तो यहीं से फूटते हैं और धीरे-धीरे समय के साथ विशाल बरगद बन जाते हैं तो सबकी चिंता का कारण बन जाते हैं । आज जो टेलीविजनों पर हिंसा और नग्नता को जिस तरह परोसा जाता है उसका असर मासूम मन पर क्या पड़ता होगा ,इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता होगा। हलाँकि ये विषय काफी पेचीदा और पुराना हो चुका है और इनपर लम्बी बहस और चर्चाएँ चलती ही रहती है । फ़िर भी इसका कोई सही निराकरण नही निकल पाया है । मैं भी कोई निवारण नही सिर्फ़ कारण ही बता रहा हूँ कि आज के फलते-फूलते आधुनिक रचनात्मक अपराध के बीज बचपन से ही अंकुरित होते रहते हैं ,जिसके लिए एक हद तक हमारा मीडिया वर्ग जिम्मेदार है ,जिसने अपराध को एक व्यापार बनाकर उसे ग्लैमरस कर दिया है । ये तो कहने की बात नही हमारा समाज हमेशा से ग्लैमर के पीछे ही भागता रहा है । आज के बचपन को जिस तरफ़ ग्लैमर दिखेगा, उसके लिए उसी और के रास्ते अपने आप खुलने लगेंगे । इसमें हम और आप कुछ नही कर सकते हैं ।
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5 comments:
नये ब्लॉग की हार्दिक शुभकामनाए.. आशा है निरंतर आपकी ब्लॉग पे पाठन सामग्री मिलती रहेगी..
नये चिट्ठे का स्वागत.
पहली पोस्ट भी पसंद् आयी. उम्मीद है कि ऐसे ही लिखते रहेंगे.
(1976-77 के वर्ष में मैं भी आईआईटी बम्बई ( हां ,तब बम्बई ही था) का छात्र रहा हूं.)
शुभकामनायें
हिन्दी चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है. नियमित लेखन के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाऐं.
बढिया प्रयास है आपका, धन्यवाद । इस नये हिन्दी ब्लाग का स्वागत है ।
मेरी यूरोप यात्रा की एक झलक’
आरंभ ‘अंतरजाल में छत्तीसगढ का स्पंदन’
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