Saturday, July 26, 2008
सिलसिलेवार धमाकों से त्रस्त है नगर-जीवन
अभी बंगलौर में बम धमाकों की चीख थमी नहीं थी कि अहमदाबाद के सिलसिलेवार धमाकों ने पूरे देश को दहला कर रख दिया । काफी सोच-समझ और सतर्कता से किया गया ये कांड निश्चित रूप से हमारी सुरक्षा समीतियों के लिए एक काला अध्याय छोड़ता है । अभी हाल ही में जयपुर में धमाके हुए थे और अब बंगलौर एवं अहमदाबाद में ये तांडव देखने को मिला । आख़िर मानवता पर कालिख पोतने वाली ये करतूतें करता कौन है और इतने कारनामों को अंजाम होते हुए देखकर भी हमारी सुरक्षा समीतियाँ कहाँ सोयी हुयी है । हो सकता है कि आने वाले कुछ दिनों में दिल्ली भी बम धमाकों की गूँज सुन ले, तब जाकर संसद की नींद टूटेगी । अभी तो उसे एक दूसरे पर कीचड़ उछालने से भी फुर्सत नही है । दरअसल हमारे देश की जनता केवल तमाशा देखना चाहती है और इसलिए नेता लोग संसद में तमाशा करते हैं और कुछ सिरफिरे लोग शहर की सड़कों पर । अभी-अभी अहमदाबाद के सिलसिलेवार धमाकों के बारे में सूत्रों का कहना है कि बिस्फोटक टिफिन में थे और सायकिल का प्रयोग किया गया था। ज्ञात हो कि आज के धमाके में १८ लोग हताहत हुए हैं, जिससे निश्चित ही हवाओं में एक खौफ व्याप्त हो चुका है । आसपास के नगरों में रेड-अलर्ट घोषित किया जा चुका है, पर अब नींद से जागने पर क्या फायदा होगा , एक काला पन्ना तो लिखा जा चुका है जो कि एक टीस के समान नगर-जीवन में उठती ही रहेगी। अब मुंबई या दिल्ली के लोग बाहर निकलने से जरूर हिचकेंगे और हमारा महानगर-जीवन इन धमाकों की गूँज से बहुत दिनों तक प्रभावित रहेगा । आख़िर आतंकवाद को इससे क्या मिलता है , कौमी जेहाद के नाम पर लोग क्या कर गुजरते हैं , और हमारी सुरक्षा-व्यवस्था इतनी लचर क्यों है , ये कुछ सवाल भी खड़े होते हैं जिनका जवाब आसान नही है ।
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