Friday, August 8, 2008

अर्थ खोता हुआ आज का जीवन

आज हम जीवन-मूल्यों को तो भूल ही चुके हैं, अब जीवन के मूल्य को भी भूलने लगे हैं । आज ही समाचारों से पता चला कि पुणे में एक २५ वर्ष के नवयुवक ने अपने कार्यालय से कूदकर आत्महत्या कर ली। आत्महत्या तो अब आम बात हो गयी है, मगर वो आई.आई.टी. का पूर्व छात्र था और इसीलिए मैंने वो समाचार पढ़ लिया । उस समाचार के नीचे करीब सौ के आसपास टिप्पणियां थी, जो कि लोग ऐसे नाजुक मौकों पर करने से नाहीं चूकते हैं। दरअसल शीशे के महलों में रहने वाले दूसरों पर पत्थर फेंकने से डरते तो हैं मगर कोई बालू का घर दिख जाए तो उसपर पत्थर बरसा ही डालते हैं। जैसे मैंने भी इसे एक विषय बना ही डाला, हालांकि मैं उनके परिवारवालों से सहानुभूति रखता हूँ ,भगवान उन्हें इस कठिन घडी में हौसला प्रदान करें। उस प्रतिभाशाली आई.आई.टी. वाले छात्र की परेशानी ये थी कि वो कार्य दबाव को नहीं झेल पाया, आई.टी. के तकनीकों के जाल में तनाव-ग्रस्त हो गया और दुनिया को अलविदा कह दिया। और अब पूरा समाज और देश इस आई.टी. को दोष दे रहा है कि भला एक आई.आई.टी. का छात्र कैसे आई.टी. से परेशान हो गया । सच तो ये है कि उसके परिवार,समाज और देश ने उसे एक सफल आई.टी. इंजीनियर बनने को इतना मजबूर करदिया कि उसके अहं ने उसकी हत्या कर दी। आत्महत्या का मतलब ही है कि जिसकी हत्या उसकी अहं कर दे । मुझे आश्चर्य होता है कि लोग पाश्चात्य जगत से उनकी गंदगियाँ तो उधार ले लेते हैं, मगर ये क्यूँ नहीं देख पाते हैं कि वहाँ के लोग कितना अर्थपूर्ण जीवन जीते हैं। वहाँ हर किसी को अपने जीवन-मूल्यों को अपनाने की छूट होती है , और किसी भी भाषा या विषय को कम नहीं समझा जाता है। पर हमारा समाज दिखावे और हौवा जैसी बातों पर ही चल रहा है । आज इंजीनियर और डाक्टर इतना बड़ा हौवा बन चुका है कि मेरे जैसे प्रतिभाशाली छात्र को कला के विषय पढने की इजाजत न ही परिवार देगा, न ही समाज और इसलिए न ही मेरा अहं। और इस तरह मेरे जीवन का अर्थ भी खोता चला जायेगा इस समाज के अंधेरे में ।

4 comments:

Anil said...

हाल ही में एक फिल्म देखी थी, जिसमें आमिर खान कहते हैं "अगर दौड़ में हमेशा फर्स्ट ही आना है तो बच्चे क्यों पैदा करते हो? घोड़े पैदा करो!"

रही बात अर्थ की, मेरे एक मित्र शिकागो में रहते हैं। एक दिन उनके ३ साल के बेटे ने उनसे कहा "पिताजी आप मुझे अपना जीवन नहीं जीने दे रहे"। दिल्ली में रहनेवाले बहुत से ३० साल से ऊपर के देखे हैं जिन्हें यही नहीं मालूम कि उनका जीवन क्या बला है!

बालकिशन said...

आपकी चिंताएँ जायज है.
बहुत कुछ बदलना चाहिए.

Udan Tashtari said...

विचारणीय तथ्य हैं.

आलोक कुमार said...

मुझे भी ये चिंतनीय बात लगती है ... अनिल जी की बातें जायज हैं.