सिमी जिसे अब तक सारे लोग मात्र छात्र-संघ या गुट समझकर ढील देते रहे, आज उसका साहस चरम सीमा तक पहुँच गया है। भारत की राजधानी दिल्ली में धमाके करने के लिए कितने साहस और पागलपन की जरूरत है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। दिल्ली में धमाका करने का मतलब एक आत्मघात था और जो हुआ भी उनका मास्टरमैंड अब पुलिस की हिरासत में है। इसका मतलब तो ये हो गया कि अपना सिमी भी अब लिट्टे के कदमचिन्हों पर चलने लगा है जो कि भारत सरकार के लिए चुनौती बन जायेगा। कितनी विडंबना की बात है कि सत्ता पक्ष की एक बैठक चल रही होती है और जिसमें विचार चल रहा होता है कि आतंकवाद से जमकर निपटा जायेगा और देश को आश्वासन भी दिया जाता है और और उधर उसी शहर में आतंकवादी बैठक के खत्म होने के घंटेभर में ही धमाकों का सिलसिला पैदा कर पूरे देश में दहशत मचा देते हैं।
भले ही कोई इंडियन मुजाहिदीन कितना भी दावा करे मगर सिमी की मिलीभगत को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। १२ सितम्बर को सर्वोच्च न्यायालय सिमी पर लगे प्रतिबन्ध की समयसीमा बढाती है और १३ सितम्बर को धमाकों से दिल्ली गूँज जाती है । ये सब काम सिमी के छात्रों का इसलिए भी लगता है क्योंकि धमाकों में उपयोग किए गए सारे बम कम क्षमता वाले होते हैं। मगर जिस तरह दिल्ली की भीड़ को उनलोगों ने निशाना बनाकर सौ से अधिक लोगों को हताहत कर दिया इससे उनके इरादे बहुत ही जंगली और खतरनाक लगते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि इनलोगों ने अपने दिलों में हिन्दुस्तान के प्रति कुछ ज्यादा ही नफरत भर ली है। अतः अब तो सिमी को आड़े हाथों लेना चाहिए क्यूंकि नफरत का इलाज प्रेम तब होता है जब किसी एक के दिल में नफरत हो । जब एक समूह ही संक्रमित हो जाए तो उस पर किस तरह पेश आना चाहिए इसकी रणनीति सरकार को अब अवश्य सोचनी पड़ेगी।
Saturday, September 13, 2008
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6 comments:
आपकी बात बिल्कुल सही है. पर भारत में आतंकवादियों का साहस प्रति दिन बढ़ रहा है इसका मुख्य कारण है सरकार की वोट की राजनीति. सरकार के आतंकवाद पर धुल-मुल रवैये से इन लोगों की हिम्मत बढ़ रही है. अफज़ल को फांसी न देना भी सरकार की कमजोरी के रूप में देखते हैं आतंकवादी. इस सरकार के दो मंत्री लालू और पासवान; और मुख्य समर्थक मुलायम खुल्लम-खुल्ला सिमी के पक्ष में बोलते हैं. लेफ्ट वाले हिंदू संगठनों को गाली देने का कोई मोका नहीं चूकते. यह सब आतंकवादियों का साहस बढ़ाने के लिए काफ़ी है.
mai apke vicharo or suresh chandr ji teep se sahamat hun.
हाँ हाँ... आप सही कह रहे हैं, दरअसल इन नेताओं का नाम मैं नहीं लेना चाहता था. इन नेताओं को समझना चाहिए कि आतंकवादियों का कोई मजहब नहीं होता. उसी मजहब से अबुल कलाम, शाहरुख़ खान, इरफान पठान निकलता है तो हम उसे दिल में जगह देते ही हैं मगर अफज़ल और अब्दुल शुभान जैसे लोगों के लिए कोई सहानुभूति नहीं होने चाहिए. ये बीमारी से ग्रस्त है जिसपर कीटनाशक के छिडकाव की दरकार है.
आलोक जी बात आप बिल्कुल ठीक कह रहे हो लेकिन इसे आप सीमा का साहस मत बोलो ये तो दुस्साहस है
आलोक जी मजहब का कोई झगड़ा कभी होता नहीं। मजहब झगड़े के लिए होता है।
मे शत प्रतिशत सुरेश जी की टिपण्णी से सहमत हु, ओर आप के लेख से भी. धन्यवाद
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