Friday, December 5, 2008

शहरों के बच्चे ज्यादा तेज क्यों ?

दरअसल इस ब्लॉग पर मैं समसामयिक विषयों पर विचार व्यक्त करता रहता था, मगर समसामयिक घटनाओं में ऐसी-ऐसी उथल-पुथल मचने लगी कि वक़्त की राजनीति मेरे समझ से बाहर हो गयी। अब भला इतने लोग इस्तीफे-उस्तीफे दे रहे हैं, कहीं भी कुछ भी हो रहा है, अब कैसे समझ में आए कि क्या हो रहा है ? अभी तो मैं एक छात्र ठहरा, इसीलिए सोचा कि शिक्षा और विषयों पर ही कुछ लिखना शुरु करता हूँ।
सचमुच में कहें तो इस वक़्त शिक्षा भी सरकार के सामने एक विकट समस्या है, खासकर अपने राज्य बिहार के बारे में तो मूझे जानकारी है। गाँव-गाँव में स्कूल खुले हुए हैं, मगर पढने को छात्र नहीं आते हैं, इसपर सरकार ने मध्याहन काल में भोजन भी रखा, स्कूल में शिक्षकों की संख्या काफी बढायी और तब जाकर छात्र आते हैं। सामान्यतः देखा जाता है कि शहरों के बच्चे गाँव के बच्चों की तुलना में पढायी-लिखाई में ज्यादा सफल होते हैं, इसका कारण लोग पैसा समझ लेटे हैं। एक तरह से यही कारण होता है मगर जब गाँव में भी इतनी सुविधा दे दी जाती है तब भी परिणाम यही निकलता है। अगर गाँव का कोई पराक्रमी शिक्षक जी-जान भी लगा देता है तो चंद प्रतिभाओं को ही स्वरुप दे पाता है जबकि शहरों के बच्चों पर इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ती है। इसका कारण हमारे प्रवृति के गर्भ में छिपा है। दरअसल ये सीखने की प्रवृति बहुत कुछ माहौल और वातावरण पर निर्भर करता है जो कि शहरों के बच्चों के लिए सुलभ हो जाता है। हमारे सीखने और समझने की प्रवृति मुख्यतः तीन तरह की होती है: सुनकर समझना, अभ्यास से समझना, कल्पनाशक्ति से समझना। अभ्यास से समझने में परिश्रम की दरकार होती है जिससे हर बचपन हिचकता है। जहाँ तक सुनकर समझने और कल्पनाशक्ति का सवाल है तो ये दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, कुछ लोग सीखने के लिए पहले शब्दों को सुनकर समझ लेते हैं और फ़िर उसपर बार-बार मन में कल्पना करके सीख लेते हैं। जबकि दूसरे लोग उन्हीं सुने हुए शब्दों को तभी समझ पाते हैं जब उनके बारे में कुछ कल्पना कर पाते हैं । जैसे अगर आप दूसरे तरह के लोग हैं तो आप मेरे इस लेख को तभी समझ पायेंगे अगर आपको हिन्दी से अच्छी तरह परिचित होंगे और इस लेख के भारी शब्दों से परिचित होंगे अन्यथा आपको समझाना टेढी खीर है। इसका अर्थ ये हुआ कि आपको बहुत ज्यादा समझदार होने के लिए बहुत ज्यादा शब्दों का मतलब जानना जरूरी है।
अब हम लेख पर फिर से वापस आ जाते हैं कि क्यों शहरों के छात्र ज्यादा तेज हो जाते हैं। शहरों में अभिभावक गांवों की तुलना में अपने बच्चों से ज्यादा बातें करते हैं, जिससे बच्चे ज्यादा शब्दों के जानकार हो जाते हैं। उनके पास समाचार पत्र , पत्रिकाएं, कॉमिक्स, किताबें ज्यादा से ज्यादा उपलब्ध रहती है, जिससे वे ज्यादा शब्दों की जानकारी हासिल कर लेते हैं। वहाँ बिजली की सुविधा ज्यादा होती है, जिससे टेलीविजन पर चलने वाले शो, न्यूज, कार्टून, फ़िल्म भी ज्यादा शब्दों को सीखने में मदद कर देते हैं। इनसब कारणों से हम अनुमान लगा सकते हैं कि एक दस साल का बच्चा जो पांचवीं पास करता है, अगर वह शहर का है तो उसके पास पाँच सौ गुना ज्यादा शब्दों की अधिक जानकारी है। अब अगर उस बच्चे को कुछ सिखाना हो तो उसे सीखने और समझने में ज्यादा आसानी होगी, जबकि गाँव के बच्चे को सिखाने में आपको भी तकलीफ ही होगी। बचपन का दस साल कुछ अनोखा होता है, उस वक्त सीखे गए शब्द आपपर अनोखा प्रभाव छोड़ता है, वे आपके प्राकृतिक मित्र बन जाते हैं। बचपन में जिस चीज में आपकी रूचि बन जाती है वही आपके जीवन पर अमिट प्रभाव छोड़ती है, शायद इसका भी उपर्युक्त कारण ही होता है । इसीलिए अगर सरकार गाँव-गाँव में शिक्षा का प्रचार-प्रसार कर रही है तो उसका मकसद वहाँ के छात्रों को तेज-तर्रार भी बनाना होना चाहिए। वहाँ सार्वजनिक पुस्तकालय, वाचनालय की व्यवस्था होनी चाहिए, बिजली जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध होनी चाहिए, तब जाकर गांवों के बच्चे भी शहरों के बच्चों की तरह तेज बन पायेंगे।

6 comments:

Udan Tashtari said...

सजग आलेख, बधाई.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

सही कहा आपने बहुत अच्छा लेख लिखा है

कुश said...

मैं समझता हू की मेरे मानसिक विकास में टी वी और अख़बारो का बहुत हाथ रहा है... अभी ये काम हमने इंटरनेट क सौंप रखा है..

डॉ .अनुराग said...

एक्स्पोसर ......चाहे वो किसी भी माध्यम से मिले .नन्हे बच्चो के विकास में बेहद सहायक होता है .इसलिए कुछ लोगो ने सभी स्कूलों में एक शिक्षा की भी बात की थी.....

Monil said...

Alokji...bahut achhi tarah likhaa aur prastut kiya hai ... badhaai !!

आलोक कुमार said...

Dhanyawaad!!