Wednesday, July 30, 2008

रामू की नयी चलचित्र से प्रभावित थे आतंकी

अहमदाबाद में पिछले दिनों हुए जानलेवा बम धमाकों को अंजाम देने वाले आतंकी रामगोपाल वर्मा की नई चलचित्र 'कान्ट्रेक्ट ' से प्रभावित थे । चलचित्र के अन्तिम दृश्यों में खलनायक एक सिलसिलेवार बम-धमाकों की योजना बनाता है । वो योजना बहुत ही खौफनाक थी, जिसे नायक (जो ख़ुद आतंकी है ) सहन नही कर पाता है और अपने नेता को ही समाप्त कर देता है और चलचित्र भी समाप्त हो जाती है । पर चलचित्र की ये समाप्ती कुछ अवांछनीय लोगों को हजम नही हो पाती है और वे उन्हीं योजनाओं को परदे से बाहर लेकर सफल करने का प्रयास करते हैं । चलचित्र के अनुसार जो योजना थी, उसमें साफ़ था की सबसे पहले कम घातक बमों का इस्तेमाल करना और अस्पताल के पास करना ,जब घायल को अस्पताल पहुंचाया जाए तो एक अति घातक बिस्फोट से अस्पताल उड़ा देना । चलचित्र के प्रदर्शन के कुछ दिनों बाद ऐसा ही कुछ अहमदाबाद में हुआ था। हमारे निर्देशकों को अपना तेज दिमाग आतंकियों में इस तरह नहीं बांटना चाहिए की देश पर संकट की विकट समस्या आ जाए। वे तो एक नायक से ही सारी समस्या निपटा लेते हैं पर हकीकत में देश को कई नायक गंवाने पड़ जाते हैं । अभी सूरत में किस तरह हमारी पुलिस जान पर खेल बार बमों को निष्क्रिय कर रही है, वो तो हम देख ही रहे हैं । जिस तरह गुजरात बम-धमाकों को विफल कर रहा है उसके लिए मोदी को साधुवाद मिलना चाहिए। और हमारे चलचित्र निर्माताओं को भी चाहिए की वे बम विस्फोट की योजना की जगह ,बम-निष्क्रिय की योजना को चित्रित करें तो बेहतर होगा ।

Monday, July 28, 2008

पानी-पानी होती मुंबई की सड़कें

चौंकिये मत, सचमुच इस वक़्त मुंबई की सड़कें पानी-पानी हो रही है । ऎसी बात नही है कि सड़कों ने कोई गुनाह किया हो और मुझे ऐसा कहना पड़ रहा है , दरअसल ये तो घनघोर बरसात की करतूत है । मानसून की मुसलाधार बौछार ने मुंबई के सड़कों का नजारा ही बदल कर रख दिया है । ये तो मुंबई ही है जो कि इतनी बारिश में भी दौड़ रही है । पहले तो मैं बंबई लिखने वाला था , लेकिन अचानक ये सोचकर डर गया कि कही पाठकों में से कोई राज ठाकरे का समर्थक निकल गया तो पता नही क्या कोहराम मच जायेगा । सुना है कि वे लोग सेंसर बोर्ड को भी धमकी दे चुके हैं कि आगे से अगर किसी भी फ़िल्म में बंबई का प्रयोग देखो तो उसे प्रमाण पत्र मत देना । हो सकता है मेरा भी ब्लॉग जाली करार दिया जाए ,या मैं वैसे ही बिहार का हूँ ,पता नही कल मनसे के लोग मनोज बाजपेयी के घर को तोड़-फोड़ डालें । इसीलिए मैंने कोई ग़लती नही की और याद करके मुंबई ही लिखा । पर मैं तो पानी की बात कर रहा था , बात ये भी है की इस पानी ने मेरे स्वास्थ्य पर भी पानी फेर दिया । पिछले दो दिनों से मैं बीमार बैठा हूँ और दवा भी नहीं खा रहा हूँ क्योंकि मेरा मानना है कि जो बीमारी प्राकृतिक हो ,उसका इलाज भी प्राकृतिक ही होना चाहिए । वैसे आज मैं आराम महसूस कर रहा हूँ ,और अपने खिड़की से बारिश की रिमझिम देखते हुए, अपने चिट्ठे पर लिख भी रहा हूँ । इस लगातार बारिश से मुंबई को एक फायदा तो जरूर होगा ,सीमी वाले इतनी बरसात में सायकिल से अगर बम ले जायेंगे तो बम रास्ते मेंं ही भींग जायेगा । चलिए जब तक बरसात चलती रहे तब तक बम का डर नही है , मगर इसी तरह बरसात चलती रहे तो पूरा मुंबई पानी-पानी हो जायेगा।

Saturday, July 26, 2008

सिलसिलेवार धमाकों से त्रस्त है नगर-जीवन

अभी बंगलौर में बम धमाकों की चीख थमी नहीं थी कि अहमदाबाद के सिलसिलेवार धमाकों ने पूरे देश को दहला कर रख दिया । काफी सोच-समझ और सतर्कता से किया गया ये कांड निश्चित रूप से हमारी सुरक्षा समीतियों के लिए एक काला अध्याय छोड़ता है । अभी हाल ही में जयपुर में धमाके हुए थे और अब बंगलौर एवं अहमदाबाद में ये तांडव देखने को मिला । आख़िर मानवता पर कालिख पोतने वाली ये करतूतें करता कौन है और इतने कारनामों को अंजाम होते हुए देखकर भी हमारी सुरक्षा समीतियाँ कहाँ सोयी हुयी है । हो सकता है कि आने वाले कुछ दिनों में दिल्ली भी बम धमाकों की गूँज सुन ले, तब जाकर संसद की नींद टूटेगी । अभी तो उसे एक दूसरे पर कीचड़ उछालने से भी फुर्सत नही है । दरअसल हमारे देश की जनता केवल तमाशा देखना चाहती है और इसलिए नेता लोग संसद में तमाशा करते हैं और कुछ सिरफिरे लोग शहर की सड़कों पर । अभी-अभी अहमदाबाद के सिलसिलेवार धमाकों के बारे में सूत्रों का कहना है कि बिस्फोटक टिफिन में थे और सायकिल का प्रयोग किया गया था। ज्ञात हो कि आज के धमाके में १८ लोग हताहत हुए हैं, जिससे निश्चित ही हवाओं में एक खौफ व्याप्त हो चुका है । आसपास के नगरों में रेड-अलर्ट घोषित किया जा चुका है, पर अब नींद से जागने पर क्या फायदा होगा , एक काला पन्ना तो लिखा जा चुका है जो कि एक टीस के समान नगर-जीवन में उठती ही रहेगी। अब मुंबई या दिल्ली के लोग बाहर निकलने से जरूर हिचकेंगे और हमारा महानगर-जीवन इन धमाकों की गूँज से बहुत दिनों तक प्रभावित रहेगा । आख़िर आतंकवाद को इससे क्या मिलता है , कौमी जेहाद के नाम पर लोग क्या कर गुजरते हैं , और हमारी सुरक्षा-व्यवस्था इतनी लचर क्यों है , ये कुछ सवाल भी खड़े होते हैं जिनका जवाब आसान नही है ।

Thursday, July 17, 2008

मासूम मन में अपराध की घुसपैठ

मैं बच्चों के मासूम मन की बात कर रहा हूँ । आजकल अधिकांस बच्चे अपने ज्यादातर समय टी०वी० देखकर बिताया करते हैं। वैसे भी अब इस विज्ञान-जगत में सामाजिकता इतनी संकुचित हो चुकी है कि लोग अकेला रहने में ही स्वतंत्रता का अनुभव करते हैं । और इसका असर बच्चों पर भी पड़ता है और वो भी अपना ज्यादा समय एकांत में ही बिताना सीख लेते हैं । और टेलीविजन ही तब एकमात्र साथी बच जाता है और यहीं से आरम्भ होता है उसके दिलो-दिमाग में अपराध की घुसपैठ । क्योंकि बच्चों को जो भी कार्टून या फिल्मों के माध्यम से परोसा जाता है उसमें अस्सी प्रतिशत अपराध की ही मिलावट होती है। हमारे बच्चे रामायण के राम से ज्यादा कार्टून के बैटमैन और सुपरमैन को ज्यादा आदर्श मानते हैं । आज संसार जिस अपराध की चिंता कर रहा है, उसके अंकुर तो यहीं से फूटते हैं और धीरे-धीरे समय के साथ विशाल बरगद बन जाते हैं तो सबकी चिंता का कारण बन जाते हैं । आज जो टेलीविजनों पर हिंसा और नग्नता को जिस तरह परोसा जाता है उसका असर मासूम मन पर क्या पड़ता होगा ,इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता होगा। हलाँकि ये विषय काफी पेचीदा और पुराना हो चुका है और इनपर लम्बी बहस और चर्चाएँ चलती ही रहती है । फ़िर भी इसका कोई सही निराकरण नही निकल पाया है । मैं भी कोई निवारण नही सिर्फ़ कारण ही बता रहा हूँ कि आज के फलते-फूलते आधुनिक रचनात्मक अपराध के बीज बचपन से ही अंकुरित होते रहते हैं ,जिसके लिए एक हद तक हमारा मीडिया वर्ग जिम्मेदार है ,जिसने अपराध को एक व्यापार बनाकर उसे ग्लैमरस कर दिया है । ये तो कहने की बात नही हमारा समाज हमेशा से ग्लैमर के पीछे ही भागता रहा है । आज के बचपन को जिस तरफ़ ग्लैमर दिखेगा, उसके लिए उसी और के रास्ते अपने आप खुलने लगेंगे । इसमें हम और आप कुछ नही कर सकते हैं ।