Sunday, August 31, 2008
कोसी का पागलपन
बिहार की अद्भुत नदी कोसी अब पूरी तरह पागल हो गयी है। और इसके पागलपन का इलाज केन्द्र या राज्य सरकार के पास कब आएगी ये पता नहीं । फिलहाल पते की बात ये है कि कोसी का जलस्तर अब भी बढ़ता जा रहा है और बिहार में सियासी लोग राजनीति से बाज नहीं आ रहे हैं। मुझे राजनीति तो मालूम नहीं मगर कोसी की भयावहता की पूरी जानकारी है। मेरा गाँव फुलपरास अनुमंडल, मधुबनी जिले में पड़ता है जो कि कोसी से २० किमी की दूरी पर है। इसीलिए मैं कई बार कोसी मैया के दर्शन कर चुका हूँ । जी.के. की किताबों में पढ़ा था कि चीन की ह्वान्ग्वो और अमरीका की टेनेसी के बाद कोसी का ही नाम आता है। इसीलिए जब भी जाता था तो लहरों को पढने का प्रयास करता था मगर ये क्यूँ अद्भुत है समझ नहीं पाता था। मगर जब मैंने गंगा, गंडक, यमुना आदि नदियों को देखा तो समझ पाया कि कोसी की लहरें कुछ अलग थी। सामान्यतः कोसी की लहर हर समय तीव्र और उछालभरी रहती है और बरसात में वो थोडी बौखला जाया करती है। प्रशासन बरसात में नहरों को खोल दिया करता था और नहरों का पानी हमारे गावों में भर जाया करता था । बचपन में बरसात के समय खूब तैरने के लिए पानी मिल जाता था और धान की फसलों के लिए भी। आजतक मैंने कोसी का पागल रूप नहीं देखा था , १५ साल पहले १९९३ में ये बाँध तोड़ने का प्रयास की थी मगर हमारे अभियंताओं ने जी-जान लगाकर रोक दिया था। आज १५ साल बाद हमारे अभियंता उसे रोक नहीं पाये और कोसी ने अपना पूर्वी तटबंध तोड़ दिया। अभी सहरसा-सुपौल की वेदना समझ सकता हूँ क्यूंकि इतनी तीव्र लहर के चपेट से जूझना किसी अभिशाप को भुगतने के समान है। अगर कोसी पश्चिमी तटबंध तोड़ डालता तो शायद मैं अपना गाँव उजड़ा हुआ पाता। एक साधारण सी नदी के जल पर नियंत्रण नही करके हम उसे शोक या भय का नाम देकर उसे हौवा बना डालते हैं। आज जो लाखों लोग और करोड़ों की सम्पति कोसी के पागलपन से प्रभावित हो रही है, कहीं न कहीं प्रशासन और राजनीति पूरी तरह से जिम्मेदार है ।
Friday, August 29, 2008
कितने सारे आय.आय.टी.!!!
ये कहानी थोडी ऎसी है कि एक बार मंत्रीजी को सपने में साक्षात भगवान के दर्शन हो गए। भगवान उनसे पूछ बैठे कि आख़िर उन्होंने दुनिया को दिया ही क्या है। मंत्रीजी तपाक से बोल पड़े:- सात आय.आय.टी. । सुबह नींद से जागकर मंत्रीजी को शंका हुई कि कहीं उसने भगवान से भी तो झूठ नहीं बोल दिया, क्योंकि सात आय.आय.टी. तो पहले से ही थे। उन्होंने तुंरत अपने सेक्रेटरी को बुलाया और कहा कि फ़ौरन पूरे देश में सात जगहों पर भूमि तलाश करो ।
सेक्रेटरी(जम्हाई तोड़ते हुए ): मसला क्या है ?
मंत्रीजी :- आय.आय.टी. खोलनी है ।
सेक्रेटरी ने आनन-फानन में ही सारे अधिकारियों की मुलाक़ात बुलवा ली । जम्मू से लेकर कन्याकुमारी तक की जमीन को टटोला गया और पूरी छानबीन की गयी। एक गांधीवादी अधिकारी जोर देकर बोलने लगे कि बापू की जन्मभूमि अबतक आय.आय.टी. विहीन है, वहाँ तो इसबार आय.आय.टी. खुलना ही खुलना चाहिए । इसके बाद पंजाब और राजस्थान में भी काफी जमीन मिल गयी जहाँ आय.आय.टी. ही बन सकता था। भुवनेश्वर के बाद हैदराबाद की जमीन पर मुहर लगाया गया। तभी एक अधिकारी जो बिहार के थे उनका धीरज डोल गया और वो बोलने लगे कि आख़िर बिहार को सबलोग क्यूँ भूल जाते हैं विकास के नाम पर , आख़िर पटना में भी तो इतनी भूमि खाली है । मगर सातवाँ आय.आय.टी. सबके लिए सरदर्द बन रहा था तभी मंत्रीजी का फ़ोन आ गया कि इस बार के बजट से केवल छः ही आय.आय.टी. बनाए जा सकते हैं । मंत्रीजी का मानना था कि छः आय.आय.टी. बनाने के बाद तो अगली बार पुनः चुनाव जीत ही जायेंगे तब बचा हुआ ये सातवाँ क्या पूरे सात और आय.आय.टी. बना देंगे ।
सेक्रेटरी(जम्हाई तोड़ते हुए ): मसला क्या है ?
मंत्रीजी :- आय.आय.टी. खोलनी है ।
सेक्रेटरी ने आनन-फानन में ही सारे अधिकारियों की मुलाक़ात बुलवा ली । जम्मू से लेकर कन्याकुमारी तक की जमीन को टटोला गया और पूरी छानबीन की गयी। एक गांधीवादी अधिकारी जोर देकर बोलने लगे कि बापू की जन्मभूमि अबतक आय.आय.टी. विहीन है, वहाँ तो इसबार आय.आय.टी. खुलना ही खुलना चाहिए । इसके बाद पंजाब और राजस्थान में भी काफी जमीन मिल गयी जहाँ आय.आय.टी. ही बन सकता था। भुवनेश्वर के बाद हैदराबाद की जमीन पर मुहर लगाया गया। तभी एक अधिकारी जो बिहार के थे उनका धीरज डोल गया और वो बोलने लगे कि आख़िर बिहार को सबलोग क्यूँ भूल जाते हैं विकास के नाम पर , आख़िर पटना में भी तो इतनी भूमि खाली है । मगर सातवाँ आय.आय.टी. सबके लिए सरदर्द बन रहा था तभी मंत्रीजी का फ़ोन आ गया कि इस बार के बजट से केवल छः ही आय.आय.टी. बनाए जा सकते हैं । मंत्रीजी का मानना था कि छः आय.आय.टी. बनाने के बाद तो अगली बार पुनः चुनाव जीत ही जायेंगे तब बचा हुआ ये सातवाँ क्या पूरे सात और आय.आय.टी. बना देंगे ।
Friday, August 8, 2008
अर्थ खोता हुआ आज का जीवन
आज हम जीवन-मूल्यों को तो भूल ही चुके हैं, अब जीवन के मूल्य को भी भूलने लगे हैं । आज ही समाचारों से पता चला कि पुणे में एक २५ वर्ष के नवयुवक ने अपने कार्यालय से कूदकर आत्महत्या कर ली। आत्महत्या तो अब आम बात हो गयी है, मगर वो आई.आई.टी. का पूर्व छात्र था और इसीलिए मैंने वो समाचार पढ़ लिया । उस समाचार के नीचे करीब सौ के आसपास टिप्पणियां थी, जो कि लोग ऐसे नाजुक मौकों पर करने से नाहीं चूकते हैं। दरअसल शीशे के महलों में रहने वाले दूसरों पर पत्थर फेंकने से डरते तो हैं मगर कोई बालू का घर दिख जाए तो उसपर पत्थर बरसा ही डालते हैं। जैसे मैंने भी इसे एक विषय बना ही डाला, हालांकि मैं उनके परिवारवालों से सहानुभूति रखता हूँ ,भगवान उन्हें इस कठिन घडी में हौसला प्रदान करें। उस प्रतिभाशाली आई.आई.टी. वाले छात्र की परेशानी ये थी कि वो कार्य दबाव को नहीं झेल पाया, आई.टी. के तकनीकों के जाल में तनाव-ग्रस्त हो गया और दुनिया को अलविदा कह दिया। और अब पूरा समाज और देश इस आई.टी. को दोष दे रहा है कि भला एक आई.आई.टी. का छात्र कैसे आई.टी. से परेशान हो गया । सच तो ये है कि उसके परिवार,समाज और देश ने उसे एक सफल आई.टी. इंजीनियर बनने को इतना मजबूर करदिया कि उसके अहं ने उसकी हत्या कर दी। आत्महत्या का मतलब ही है कि जिसकी हत्या उसकी अहं कर दे । मुझे आश्चर्य होता है कि लोग पाश्चात्य जगत से उनकी गंदगियाँ तो उधार ले लेते हैं, मगर ये क्यूँ नहीं देख पाते हैं कि वहाँ के लोग कितना अर्थपूर्ण जीवन जीते हैं। वहाँ हर किसी को अपने जीवन-मूल्यों को अपनाने की छूट होती है , और किसी भी भाषा या विषय को कम नहीं समझा जाता है। पर हमारा समाज दिखावे और हौवा जैसी बातों पर ही चल रहा है । आज इंजीनियर और डाक्टर इतना बड़ा हौवा बन चुका है कि मेरे जैसे प्रतिभाशाली छात्र को कला के विषय पढने की इजाजत न ही परिवार देगा, न ही समाज और इसलिए न ही मेरा अहं। और इस तरह मेरे जीवन का अर्थ भी खोता चला जायेगा इस समाज के अंधेरे में ।
Subscribe to:
Posts (Atom)