Friday, November 28, 2008
आतंक का रूप, कितना कुरूप
पिछले ४८ घंटों से पूरा मुंबई आतंक के साए से सहमा हुआ है, और उस साए को पूरी तरह से हटने का अब भी इंतजार कर रहा है । इस वक़्त माहौल में दहशत दिखता है तो सड़कों पर सूनापन सा, लोगों ने अपने टी.वी.चैनल पिछले दो दिनों से बंद नहीं किया है और कुलाबा और नरीमन का इलाका किसी युद्धक्षेत्र में बदल चुका है। मुझे ९३ का बमकांड तो याद नहीं है मगर जब से याद है आतंक का ये रूप सबसे ज्यादा कुरूप है । 'डाई हार्ड' जैसी प्रसिद्ध चलचित्रों में ही ऐसे दहशत देखे थे पर वास्तविकता में ऐसी स्थिति सोचना कल्पना से परे लगता है। केवल दो दर्जन लोगों ने पूरे देश को भयभीत कर दिया है और इस दो दिनों में ही पूरे देश का नक्शा बदल कर रख दिया है, अब इससे ज्यादा कुरूप दृश्य और क्या हो सकता है। पुलिस के तीन सुपर जांबाज़ जो कि अखबारों की सनसनी रहते थे अब वे काल के गाल में समा गए। क्रिकेट के दो वन-डे और चैंपियन ट्रोफी टी-२० का रद्द होना ही ये बतला रहा है कि हमारे और भी बहुत सारे महत्वपूर्ण कार्य रद्द हो चुके होंगे। पूरे दुनिया के मीडिया इस वक़्त मुंबई को ही समाचार बनाए हुई है, इससे हमारा बाजार और पर्यटन कितना चौपट होगा वो तो समय बतायेगा। भारत की छवि को तो इन दो दर्जन लोगों ने तो बदल कर रख दिया, मगर इन्हें बचने का भी हक़ नहीं होना चाहिए । एक बात प्रशसा के योग्य है कि भारत भी अब अमेरिका, ब्रिटेन, रूस की तरह किसी भी समझौते से इनकार कर अन्तिम कार्रवायी कर रहा है। जबकि प्रशंसा और भी तब होगी जब भारत भी आतंकवाद के ख़िलाफ़ वही रूख अपनाए जो अमेरिका ने ९/११ के बाद अपनाई थी .
Monday, November 24, 2008
बुद्धिमता
'बुद्धिमता' एक बहुत ही अच्छा शब्द है, सम्भव है कि इससे आप भी परिचित होंगे, शायद इस शब्द से आपका भी कोई रिश्ता हो । पर मुझे इससे अपने रिश्ते होने पर बराबर शक रहा है , शायद यही कारण है कि इसपर आज एक पोस्ट भी लिखने जा रहा हूँ । कारण ये है कि बचपन से आजतक जब भी कोई गलती करता हूँ तो कोई न कोई टोक देता है कि जरा बुद्धि से काम ले लिए होते। और गलतियां तो मैं बार-बार करता हूँ और ऎसी-ऐसी टिप्पणियों का शिकार बनता हूँ । दिक्कत तो ये होने लगती है कि फॉर्म भरने में गलती हो गई तो यही डायलाग सुनो, रिक्सवाले ने ज्यादा किराया ले लिया तो भी यही डायलाग सुनो, कभी दोस्तों से सुनो तो कभी माता-पिता से। आख़िर सोचना पड़ता है कि हमसे बुद्धिमता जी सचमुच तो नाराज़ नहीं हैं, पर फ़िर सोचने लगता हूँ कि इतने बड़े-बड़े इम्तिहान पास किए और इतना ज्यादा-ज्यादा अंक लाया हूँ । दरअसल मुझे सोचने कि ऐसे ही आदत है, कुछ भी सोचता रहता हूँ , जैसे अभी-अभी सोचने लगा हूँ कि बुद्धिमताजी मुझसे ऐसे ही नाराज होते रहती है। ये सब जो विद्वता जी की कृपा रहती होगी मुझपर जो मैं संकट से बच जाता हूँ।
ये विद्वता और बुद्धिमता दो अलग-अलग चीज होती है, पर देखने में एक जैसे ही लगती है । हो सकता हो कि अपने पिछले जन्म में दोनों जुड़वां बहने रही हों। अन्तर जानने के लिए हम कह सकते हैं कि मनमोहनजी के पास विद्वताजी हैं और लालूजी के पास बुद्धिमताजी । इसीलिए किसी को कमजोर नहीं कह सकते हैं, पर हाँ एक बात है कि अगर आपपर विद्वता कि कृपा है तो बुद्धिमता पा सकते हैं मगर बुद्धिमता की ज्यादा कृपा हो गई तो पता नहीं आपमें विद्वता आ पाये या नहीं। ऐसा इसलिए की बुद्धिमता की महिमा अपरम्पार है । ये बहुत ही चतुर हुआ करती है, सारी बातें चुटकियों में समझ जाए, बोलने में भी चतुराई दिखाए और हर परिस्थितियों में ढल जाए, ऐसी इनकी विशेषता हुआ करती है। दरअसल ऐसा माना जाता था कि अगर आप जितनी चतुराई और सतर्कता से अपने आपको विपरीत परिस्थितियों में भी तेजी से ढाल लेते हैं, आप उतने ही बुद्धिमान कहलाते हैं। फ़िर हुआ क्या कि विद्वान लोग हो-हल्ला मचाने लगे कि ऐसा कैसे हो सकता है कि हम तो ख़ुद को ढाल ही नहीं पाते हैं तो क्या हम बुद्धिमान नहीं हुए। अजीब आदमी लोग थे सब जबरदस्ती पर आ गए, उनमें से कुछ तो किताबें लिखकर, कवितायें सुनाकर, नाटक दिखाकर परिस्थितियों को ही बदलने लगे। वो ख़ुद को तो नहीं ढाल पाये, पर अपने अनुसार परिस्थितियों को ही ढाल दिया, और ख़ुद को बुद्धिमान कहा। और इस तरह नई परिभाषा बनी कि, आप जितनी चतुराई और सतर्कता से अपने आपको विपरीत परिस्थितियों में तेजी से ढाल लेते हैं या फ़िर जितनी चतुराई और सतर्कता से विपरीत परिस्थितियों को ही अपने अनुसार ढाल देते हैं आप उतने ही बुद्धिमान कहलाते हैं॥
ये विद्वता और बुद्धिमता दो अलग-अलग चीज होती है, पर देखने में एक जैसे ही लगती है । हो सकता हो कि अपने पिछले जन्म में दोनों जुड़वां बहने रही हों। अन्तर जानने के लिए हम कह सकते हैं कि मनमोहनजी के पास विद्वताजी हैं और लालूजी के पास बुद्धिमताजी । इसीलिए किसी को कमजोर नहीं कह सकते हैं, पर हाँ एक बात है कि अगर आपपर विद्वता कि कृपा है तो बुद्धिमता पा सकते हैं मगर बुद्धिमता की ज्यादा कृपा हो गई तो पता नहीं आपमें विद्वता आ पाये या नहीं। ऐसा इसलिए की बुद्धिमता की महिमा अपरम्पार है । ये बहुत ही चतुर हुआ करती है, सारी बातें चुटकियों में समझ जाए, बोलने में भी चतुराई दिखाए और हर परिस्थितियों में ढल जाए, ऐसी इनकी विशेषता हुआ करती है। दरअसल ऐसा माना जाता था कि अगर आप जितनी चतुराई और सतर्कता से अपने आपको विपरीत परिस्थितियों में भी तेजी से ढाल लेते हैं, आप उतने ही बुद्धिमान कहलाते हैं। फ़िर हुआ क्या कि विद्वान लोग हो-हल्ला मचाने लगे कि ऐसा कैसे हो सकता है कि हम तो ख़ुद को ढाल ही नहीं पाते हैं तो क्या हम बुद्धिमान नहीं हुए। अजीब आदमी लोग थे सब जबरदस्ती पर आ गए, उनमें से कुछ तो किताबें लिखकर, कवितायें सुनाकर, नाटक दिखाकर परिस्थितियों को ही बदलने लगे। वो ख़ुद को तो नहीं ढाल पाये, पर अपने अनुसार परिस्थितियों को ही ढाल दिया, और ख़ुद को बुद्धिमान कहा। और इस तरह नई परिभाषा बनी कि, आप जितनी चतुराई और सतर्कता से अपने आपको विपरीत परिस्थितियों में तेजी से ढाल लेते हैं या फ़िर जितनी चतुराई और सतर्कता से विपरीत परिस्थितियों को ही अपने अनुसार ढाल देते हैं आप उतने ही बुद्धिमान कहलाते हैं॥
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