मैं जानता हूँ कि आपका जवाब हिन्दी ही होगा और हो सकता है कि आप हिन्दी में ही सोचते हों मगर क्या इसका मतलब हम ये मान लें कि हम अपनी मातृभाषा में ही सोचते हैं। बहुदा मैंने बहुत लोगों के मुंह से ये कहते सुना है कि अमुक भाषा से तो मुझे सम्बन्ध रखना ही है, आख़िर हम सोचते तो अमुक भाषा में ही हैं। मैंने बहुत जगह हिन्दी प्रचार में भी सुना है कि आइये हिन्दी से जुडें, क्यूंकि सोचते तो हम हिन्दी में ही हैं। दरअसल इनका कहना होता है कि हम कितने भी दूसरी भाषा या विदेशी भाषा का प्रयोग जीवन में कर लें सोचने के लिए अपनी मातृभाषा का ही प्रयोग करते हैं। शायद इनका कहना सही भी हो मगर इस लेख में मैं एक अलग मत प्रस्तुत कर रहा हूँ।
सबसे सच बात ये है कि हमारे दिमाग पर वो भाषा हावी होती है जो भाषा बाजार में प्रयोग होती है। आजकल के जीवन में बाज़ार एक अहम् स्थान रखता है और प्रचार-प्रसार माध्यमों के बढ़ जाने से ये हमारे जीवन के निकटतम होता जा रहा है। इसीलिए हमारे सोच पर ये बाज़ार की भाषा हावी हो जाती है, अब भला बाज़ार में ' INDIA SHINING' के नारे चले तो भला कोई भारतवासी क्यूँ सोचेगा कि भारत चमक रहा है। इसी तरह आज के समय हमारे बाज़ार में जो भी स्लोगन है अधिकतर अंग्रेजी में है फ़िर ये सोचना कि हम सोचने के लिए मातृभाषा का इस्तेमाल करते होंगे, थोड़ी सी नाइंसाफी है। ये तो छोटी सी बात हुई, एक बड़ी बात ये भी है कि हमारे यहाँ का एक बड़ा सा भाग पढाई-लिखाई करता है, और सामान्यतः बड़ी पढाई के लिए अंगरेजी माध्यम का ही इस्तेमाल करता है। अब इस भाषा पर हमारा कैरियर निर्भर करता है, इसी भाषा में हमें विचार विक्सित (Idea development) करने हैं, तो भला आप बताएं कि हमारे सोचने की भाषा क्या हो सकती है, निश्चित तौर पर कहीं न कहीं यहाँ भी बाज़ार किसी रूप में प्रभाव डाल रहा है।
इसके अलावा हमारे सोच पर वो भाषा भी बहुत प्रभाव डालती है जो हमारी इन्द्रियों के सबसे करीब हो, और आज के युग में हमारी इन्द्रियों को सबसे ज्यादा प्रभावित करने के साधनों में से एक है इन्टरनेट , और इन्टरनेट की भाषा भी हमारे सोच पर असर डालती है। ये तो गूगल को धन्यवाद कहना होगा कि थोडी-बहुत हिन्दी-प्रयोग इन्टरनेट पर हो जाती है और इसलिए हमलोग हिन्दी में भी सोच लेते हैं। एक और साधन भी है मीडिया और चलचित्र, साधारनतया हम चलचित्र जिस भाषा की देखने की शौक रखते हैं, उसी भाषा के डायलोग और गाने हमारे दिमाग में चलने लगते हैं और फ़िर उस भाषा में सोचने से कोई मातृभाषा नहीं रोक सकती है। दूसरी बात भी सही ही है कि जिस भाषा के मीडिया का इस्तेमाल करेंगे उसी भाषा में तर्क और प्रश्न हमारे मन में उठेंगे । और भी बहुत सारे साधन और माध्यम हैं जो हमारी सोच और भाषा को प्रभावित करती है , लेकिन हर किसी का सम्बन्ध बाज़ार से जुड़ा हुआ रहता है।
इसीलिए हम सोचने के लिए मातृभाषा से ज्यादा अपने बाज़ार की भाषा का प्रयोग करते हैं !!
Sunday, February 8, 2009
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1 comments:
आप ये भी कह सकते हैं कि हमारे सोचने और बोलने की भाषा हिंदुस्तानी है।
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