Sunday, March 15, 2009

कवि /कलाकार अक्सर ऐसा क्यों करते हैं?

पता नही ऐसा क्यों, मगर आप कितने भी बड़े कवि को बड़े-बड़े मंचों पर सुनेंगे तो यही लगेगा कि वे पुराना प्रदर्शन ही दोहरा रहे हैं। हाल ही में जो कवि-सम्मलेन हुआ था उनके कलाकार पहले भी सन्स्थान में आए हुए थे, सब बातें नई और चुटीली कर रहे थे लेकिन कविता वही सुनाने लगते थे जो पहले भी सुनाकर गए थे। एक दर्शक की पीड़ा से ज्यादा तो कवि ख़ुद समझते होंगे क्योंकि वे तो अक्सर कई सम्मेलनों में जाते हैं, इसीलिए उन्हें जो भी कविता सुनने को मिलती होगी वे पहले ही उसे सुन चुके होते होंगे। तब तो वह इस दर्द को बखूबी समझते होंगे लेकिन जब वही मंच पर जाते हैं तो इस दर्द पर मलहम लगाना तो दूर, इसे जिन्दा करने लगते हैं। दरअसल उनकी कोई गलती नहीं होती है, गलती तो उनके अंदर का वो कलाकार कर देता है जिसे उसकी पुरानी कला ने मोह-पाश में बाँध रखा है। अब कलाकार तो कोमल होता है, वह अपनी पुरानी कला को नाराज़ नहीं कर सकता है न, इसीलिए ये गलती कर बैठता है । ऐसी बात नही होती है कि ये कवि या कलाकार होनहार नही होते या ये कुछ नया नहीं लिखते हैं। दरअसल ये बहुत नई रचनाओं का सृजन करते हैं मगर नई रचनाओं को प्रस्तुत करके अपनी छवि को खोने का हौवा सताता है। ये कवि अपनी छवि नही खोना चाहते हैं। क्या होगा कहीं ये नई रचना जनता को पसंद नहीं आए या शायद इस भीड़ में ज्यादा लोग तो मुझे पहली बार सुन रहे हैं, उन्हें तो पुरानी वाली रचना जरूर सुनानी चाहिए। शायद इस तरह के प्रश्न उठते होंगे उनके दिमाग में ...
अब दिमाग से याद आया कि इसकी संरचना बहुत ही जटिल होती है, अनेक कोशिका, अनेक तंत्रिका, जिनमें से कुछ जुड़े-जुड़े होते हैं और कुछ अलग-अलग होते हैं। सीखने की प्रक्रिया में ये शायद हमारी मदद करती है। अब कला भी एक सीखने की ही प्रक्रिया है, जिसमे अभ्यास की दरकार होती है। जब शुरू-शुरू में कला का जूनून सवार होता है तो हम उसका बहुत अभ्यास करते हैं और जितना अभ्यास करते हैं उतने ही मजबूत तरीके से दिमाग की कोशिकाएं जुड़कर उस ख़ास कला के मार्ग का निर्माण कर देती है। अब हम यहाँ-वहाँ मंच ढूंढते हैं और हममें से कुछ भाग्यशाली लोग अपनी कला के प्रशंसक को पा लेते हैं। कुछ दिनों बाद एक छवि बन जाती है अब हमारा काम बढ़ जाता है और अब छवि को भी संभालकर रखना है। इसीलिए एक बार चमकने के बाद जो कला का निर्माण हम करते हैं शायद पहली की तरह सख्त नही हो पाती, मेरा मतलब दिमाग कि कोशिकाएं उसके लिए कम मजबूती से जुड़ती होंगी। इसीलिए जब भी हम मंच पर जायेंगे, नए प्रदर्शन के लिए मन में डर आएगा और हम फ़िर से पुराने प्रदर्शन की ही पुनरावृति करेंगे ।

1 comments:

अनुनाद सिंह said...

बढ़िया विचारा है!