Wednesday, November 11, 2009

मुझे आश्चर्य है इस कलम पर

कभी-कभी मुझे इस कलम पर आश्चर्य होने लगता है। जो बात मुझे भी पता नहीं रहती है,उसे भी ये लिख देती है, व्यक्त कर देती है। कभी-कभी तो बहुत आश्चर्य हो जाता है, जो ये कलम लिख देती है वह होने लगता है। हँसिये-हँसिये आपको लग रहा होगा कि ये पागल लेखक अपनी फंतासी की दुनिया में है। पिछले ही दिनों की घटना है, एक हँसी का मुकाबला था IIT में, मैंने एक हास्य कविता तैयार की थी। उस कविता के अंत में मैंने चीते का IIT में नामांकन करा दिया था। पता नहीं मेरी कविता से कितने लोग हंस पाये मगर एक घटना जरूर हुई, जिस समय मैं अपनी कविता सुना रहा था उसी समय एक चीता संस्थान परिसर में छात्रों द्बारा देखा गया। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ, क्योंकि चार साल से तो यहाँ कोई चीता नहीं था, या हो सकता है कि देखनेवाले का भ्रम हो। मगर ये बात IIT कि हवा में अब भी है कि चीता उसी वक्त देखा गया था। मगर शायद किसी ने ध्यान नही दिया मेरी कविता पर (वैसे भी कवि के कलम पर कौन विश्वास करता है) सिवाय मेरे एक कलाकार मित्र स्नेहिल गौतम के जिन्होंने बार-बार कहा कि ये चीता आपकी ही कविता से निकला है। मैं तो मजाक में हंस दिया था, लेकिन अभी सोच रहा हूँ कि कहीं सही में तो ऐसा नहीं होता है। इसी को लेकर मुझे आश्चर्य है अपनी कलम पर।
अगर कोई इंटरनेट सवेदनशील लोग गलती से इसे पढ़े तो इसे गंभीरता से न लें, बहुत दिनों से कुछ लिखा नहीं था इसीलिए बक-बक लिख दिया।

1 comments:

Udan Tashtari said...

जाने क्यूँ मना करने पर भी गंभीर हो गये...क्षमा करना मित्र!!